Saturday, 22 March 2025

Random #38

 इतना तो सचमुच में समझदार बनना था 

मुझे भी थोड़ा बहुत अदाकार बनना था 


लेकर ढोते हुए सभी जुर्मों को सर अपने 

कभी तो सचमुच में गुनाहगार बनना था 


जिस शिद्दत से रहा तलबगार दुनिया का 

इस दुनिया को मेरा तलबगार बनना था


चारागरों के बीच में रख छोड़ना था जब 

मुझको तो फिर ज़ेहनी बीमार करना था 


रस्मे-वादा ताउम्र निभाने की चीज है 

ये सोच कोई वादा मेरे यार करना था 

Tuesday, 18 March 2025

Random #37

 और फिर एक रोज वो नूर भी जाता रहा 

ज़ुस्तज़ू जाती रही, फ़ितूर भी जाता रहा 


खड़े दरख्तों से जब टूट गए शाख़ सब 

सबके साथ होने का गुरूर भी जाता रहा 


बेबाक बातों ने छीन लिया एहतिराम सब 

लिख कर कह देने का दस्तूर भी जाता रहा 


हम तो पशेमान हैं, हम तो कुसूरवार थे 

हथकड़ी में कैद हो बेक़सूर भी जाता रहा 


उसको आता ही नहीं था साथ रहने का हुनर 

हाथ बढ़ाता रहा और दूर भी जाता रहा 

Sunday, 19 January 2025

Random#36

 रास्तें में कोई ऐसा शजर होता 

आने-जाने वालों का घर होता 


सब रूकते छावँ की तलाश में 

कितना आसान ये सफर होता 


परिंदा पिंजड़े को तोड़ उड़ता 

कहीं ऐसा भी एक मंजर होता 


आसमां नीचे होता, जमीं ऊपर

दरिया में गिर रहा समंदर होता 


तलवारें म्यान में वापस जाती  

सामने झुका हुआ सर होता 


दिलों में बस रहे ये लोग होते 

गांव में बसा एक शहर होता 




Friday, 1 November 2024

Random#35

 कहाँ आ गए हैं हम और किधर जाना चाहिए था 

ऐसे मौसमों में तो कहाँ, बस घर जाना चाहिए था 


दूर निकल आये हैं यूँ कि अब तो लगता है जैसे 

कुछ देर तो राहें-सफर में ठहर जाना चाहिए था


हम तो चलते चले जाएं पर फ़क़त मसअला ये है

ऐसी आरज़ू से किश्मत को संवर जाना चाहिए था


जब कभी देखा था  चाँद को हमने अपने तस्सवुर में 

कश्ती से हमको भी चुपचाप उतर जाना चाहिए था  


सोचता हूँ, इतनी इबादतों का कुछ हश्र तो होना था 

निखर जाना चाहिए था या बिखर जाना चाहिए था 

Thursday, 18 July 2024

Random #34

 हमने देखे हैं चंद लम्हों में ज़माने कितने 

उन लम्हों में ज़िन्दगी के फ़साने कितने 


मुड़कर देखने से कभी हैरत तो होती है 

वस्ल की आस में बदले हैं ठिकाने कितने 


मैं जिसकी आरज़ू रही बस राब्ता होना 

वो, जिसे आते थे रंजिशों के बहाने कितने 


हो राज़ मालूम तो क़यास क्यों लगायें जाएँ 

इस रुख़सार पर फ़िदा हैं न जाने कितने 


एक ज़रा सी ख़लिश और फिर राहें जुदा

अब होते हैं इमरोज़ से दीवाने कितने ? 

Sunday, 7 July 2024

Random #33

 हमने ये कब चाहा कि वो हमारा सोचें 

डूबने वालों को लाज़िम है किनारा सोचें 


मसरूफ़ियत की दौर में किसे फुर्सत है 

वो तुमको सोचें और फिर दोबारा सोचें 


ख़ुद की काबिलियत पर नाज़ किए बैठे हैं 

वो भी रंज से गुजरें तो फिर सहारा सोचें 


दिल से सोचने वाले इतना नहीं सोचा करते 

दिमाग वाले हैं जो नफ़ा और ख़सारा सोचें 


ये सोचने का सिलसिला है दुनिया वालों का 

किसी को नकारा सोचें, किसी को आवारा सोचें 


Thursday, 27 June 2024

Random #32

 कभी गर मुंतज़िर होना तो फिर खुद की तलाश करना 

जो अनकहा कुछ सुन सके, तुम उसकी तलाश करना 


यूँ तो सभी हैं यहाँ किसी न किसी की तलाश में लापता 

जो कोई हो तुम्हारी तलाश में, तुम उसकी तलाश करना 


आईना गर टूट भी जाये तो चलो जाने दो, कोई बात नहीं 

जो कोई तुम्हें खुद से मिला सके, तुम उसकी तलाश करना 


दिलों के अंदर और बाहर के बीच का ये जो फासला है 

जो इस फासले को मिटा सके, तुम उसकी तलाश करना 


इस शहर में सब है,रौनकें हैं, शोर है, भीड़ है, तन्हाईयाँ हैं 

इन इमारतों में कोई घर बसा सके, तुम उसकी तलाश करना 

Friday, 31 May 2024

Random #31

 जो लोग दहशतों से वाकिफ़ हैं, मुमकिन है वो सहराओं से गुजरे होंगें 

इस राह से न जाने की हिदायत दी है, वो भी तो इसी राह से गुजरे होंगे 


शहर में दर-बदर भटकते हुए लोग, दौड़ते हुए लोग, गिरते हुए लोग 

छुपाकर ख़्वाब अपनी आँखों में किसी रोज अपने गांव से निकले होंगे 


अनजान लोगों के जख्मों को चूमते हुए लोग, उनसे लिपटते हुए लोग 

शायद किसी की चोटों से वो लोग भी कभी शीशे की तरह बिखरे होगें 


इन मौसमों से, बारिशों से, बादलों से, जो इस तरह की ये नाराज़गी है 

कभी आदतन मौसमों से खेलते होंगें,आदतन वो बारिशों में भींगते होंगें 


हमने जो भी देखा है, जितना देखा है, जितना जाना है, जितना समझा है 

वो सभी लोग जो बोलने से डरते हैं, वो सभी लोग लिखकर बोलते होंगें 


Monday, 6 May 2024

Random#30

 सब तजुर्बें, सारे सबक, हैं मेरे करीब क्यूँ

नहीं थे दस्तरस में तो फिर ऐसे शरीक क्यूँ 


राज़ क्या, थी बात क्या, क्यूँ हुए थे आशना 

मैं तो बस हैरान हूँ, थे इतने करीब क्यूँ 


वो ज़ुस्तज़ू, वो नवाज़िशें, हसरतें, वो चाहतें 

फिर इन सभी के बीच में आता नसीब क्यूँ 


इत्तिफ़ाक़ है, है हादसा या कि कोई ख़्वाब है 

अब किसी भी बात का नहीं आता यकीन क्यूँ 


तुम तो आफताब थे, तुम से थी ये रौशनी 

तुम नहीं शरीक क्यूँ, तुम नहीं करीब क्यूँ 




Saturday, 30 March 2024

Random#29

 स्याह रात को रोशन करता हुआ जुगनू कोई 

हो बारिश की बुँदे या हिना की खुशबू कोई 


मशरूफ़ हैं सभी ज़िन्दगी के सफर में ऐसे 

कि होता नहीं अब किसी से रूबरू कोई 


सब्र-ए-इंतज़ार का एक हश्र यह भी तो है 

बचती नहीं किसी भी तरह की आरजू कोई 


है गर खामोश लबों से सुन सकने का हुनर 

फिर आखिर क्यों किसी से करे गुफ़्तगू कोई 


टूटे हुए साज से ये नगमा जो सुना रहा हूँ मैं 

किसी के पाँव से निकल पड़ा है घुँघरू कोई 

Sunday, 17 December 2023

Random #27

 घर हूँ इसलिए है उसके लौट आने की उम्मीद

दूर होकर भी वही फिर पास आने की उम्मीद

सब खोकर भी खड़ा है कोई पेड़ गर हू-ब-हू

होगी ही फिर नए पते पनप आने की उम्मीद

परिंदे को है तिनके की, जिस शिद्दत से तलाश

उसको भी तो होगी फिर आशियाने की उम्मीद

एक आवाज़, जो जंगलों को चीरकर आती रही

बेबसी में भी मौजूद थी जीत जाने की उम्मीद

उसके टूटने से ये जो टूट गए हैं लोग सब

ढो रहा था अपने सर, सारे ज़माने की उम्मीद 

Monday, 11 December 2023

Random #26

उसकी बेबाक हँसी और तकती हुई आँखे मेरी

मायूस हो जाये तो फिर रुक जाये सांसे मेरी

बिखेर दे जुल्फें तो फिर शामो-सहर बहार चले

रौशन सी फिज़ा और सदा रौशन रही रातें मेरी  

सुर्ख होठों की नज़ाकत से यूँ मदहोश शमा.....

उससे मिलने की तलब और बेचैन निगाहें मेरी

चूम ले जख्मों को तो फिर मरहम क्या है ?

उसकी नाज़ुक बाँहों को थामे हुई बाहें मेरी

उसकी तारीफ़ में लिखा हुआ हर हर्फ़ है पाकीज़ा

ग़ज़ल क्या है...उससे जुड़ी हुई सब यादें मेरी 

Tuesday, 8 August 2023

Random #25

 क्या होता है चराग़ जलते रहने का अंज़ाम आखिर 

ज़िन्दगी है भी तो चलते रहने का ही नाम आखिर 


सफ़र खत्म हुआ, मुंतजिर रहे फिर भी, तो समझे  

मुकम्मल होना नहीं है ज़ुस्तज़ू का मक़ाम आखिर 


क्यूँ न करते रहे हम सहर का इन्तिज़ार यूँ ही 

खत्म तो होती होगी धुंधली सी ये शाम आखिर 


जब हम बज़्म से होकर गुजरे तो हमने ये जाना 

सभी तो हैं इसी रंग-ओ-रस के गुलाम आखिर 


इस आज़ार से गुजरते हुए इतना हैरान क्यूँ हो 

यही होता है ऐसी रूहानियत का इनाम आखिर 



Monday, 10 July 2023

Random #24

 वो सवाल, जो है मेरी ज़िन्दगी का सवाल 

सब पाकर भी रह गया तिश्नगी का सवाल  


एक फूल जिसे जुदा कर दिया गुलशन से 

हर वक्त पूछता रहता है ताज़गी का सवाल 


जिस सवाल का कोई जवाब था ही नहीं 

वो सवाल भी क्या, सिर्फ़ सादगी का सवाल


कभी गर मिलेगा ख़ुदा तो फिर पूछूंगा मैं 

कोई जवाब है भी या फिर बंदगी का सवाल 


जिसके सुपुर्द कर रखी थी ये दुनिया मैंने 

उसके लिया मैं था सिर्फ़ दिल्लगी का सवाल 


सब्र करते हुए ये उम्र गुजर जाएगी यूँ ही 

चुप रहना आखिर है तो संजीदगी का सवाल  

Tuesday, 9 May 2023

Random#23

 ये सच है कि कुछ बचा नहीं है अब 

सब तेरे जैसा है बस तू नहीं है अब 


हर शाम सूरज डूबता है वैसी ही 

चाँद जमीं पर उतरता नहीं है अब 


घर बसने कहने को ही घर है 

इस घर में कोई रहता नहीं है अब 


रस्म है जो निभाई जा रही है यूँ ही 

कोई आता है तो ठहरता नहीं है अब 


कोई टूट कर इस कदर बिखरा है 

किसी के लिए भी सवंरता नहीं है अब  

Saturday, 15 April 2023

Random#22

 मैं तो सब कह दूँ लेकिन ….तुम कहते हो कि तुम समझते हो 

आँखें बयाँ करती हैं सबकुछ..बिन बोले भी सब समझते हो ?


चुप रहना क्यों जरूरी है और क्यों जरूरी है दूर हो जाना ?

सब इत्तिफ़ाक़ की बातें हैं..मैं समझता हूँ कि तुम समझते हो 


है एक दुनिया और.. तुम्हारे रुख़्सार, तुम्हारे तबस्सुम से आगे 

तुम भी दुनिया थे, ये भी दुनिया है..ये फ़ासला तुम समझते हो 


तुम्हारी बातों में एक लज्ज़त थी, तुम सच बोलते थे लेकिन 

कहना ही सब नहीं होता, तुम जो कहते थे वो समझते हो 


हमारे दरम्याँ जो कुर्बत थी, हमें था दूर होना ही एक दिन 

यही दुनिया की रिवायत है, मैं जानता हूँ तुम समझते हो 





Saturday, 17 December 2022

Random#21

दिसंबर की रात जैसे-जैसे गहरी होती जाती है 
शहर होता जाता है मौन, धुँध बढ़ती जाती है 

मैं होता जाता हूँ गुम सोचते हुए कल के बारे में 
अतीत की एक आवाज़ दीवारों से टकराती है

इस अँधेरे में भी सब कुछ दिखता है साफ-साफ 
आँखों के सामने एक तस्वीर उभरती जाती है 

यूँ तो सब बताते हैं क्या हैं खामियाँ और क्या ऐब  
यह ज़िन्दगी ही है जो सच में आइना दिखाती है 

भले हो बंद कमरे, बंद खिड़कियां, बंद सबकुछ 
एक सड़क अब भी है जो सहर तक जाती है 

Sunday, 28 August 2022

Random#20

 जब भी हम बैठे तन्हां बस तेरी याद आयी 

नींद से यूँ चौंक उठ बैठे...तेरी याद आयी 


किसी ने आवाज़ दी तो... तेरी याद आयी 

कोई हमें देख मुस्कराया...तेरी याद आयी


कंधे पे रख दिया हाथ तो तेरी याद आयी 

आईने में खुद को देखा तो तेरी याद आयी 


नाम सुना तेरे शहर का तो तेरी याद आयी 

खिड़की से किसी ने झाँका तेरी याद आयी 


सहर से शाम का वक्त हमने यूँ बिताया 

तू याद आयी... और बहुत ही याद आयी 


Saturday, 27 August 2022

Random#19

 इन आंसूओं को अंगार बनाना होगा 

मुझे इस तरह सब कुछ भुलाना होगा 


सब पूछेंगे इस नए चेहरे का राज मुझसे 

लेकिन मुझे वो पुराना शख्स गँवाना होगा 


सीने में चल रही इस कश्मकश को 

अब मुझे छोड़ दूर कही जाना होगा 


इस नए दौर में मैं नया बनाऊंगा खूद को 

रोने गिड़गिड़ाने का कोई और जमाना होगा


दिन-ब-दिन रंग बदलती हुई इस दुनिया को 

मुझे भी कभी तो अपना रंग दिखाना होगा 


लोग ढूंढेंगे कहाँ गया वो उदास सा शख्स 

मैं बोलूंगा मर गया होगा आशिक़ दीवाना होगा 


दरख्तों पर लटक रही इन तमाम यादों को 

परत दर परत जल धुआं बन जाना होगा 


इन लोगों से दूर कहीं वीरान से जंगल में 

इस नए परिंदे का एक छोटा सा ठिकाना होगा 


जब मैं कहूंगा तब उन्हें आना होगा 

जब मैं कहूंगा तब उन्हें जाना होगा 


इस बदले हुए शख्स का राज़ बताना होगा 

मैं कौन हूँ दुनिया को दिखाना होगा 


हर लहू के कतरे को बीज बन जाना होगा 

जो कुछ भी हो नया जन्म ले आना होगा 


चलना होगा गिरना होगा उठ दौड़ जाना होगा 

ख़ुद से ही लड़ना होगा ख़ुद को ही हराना होगा 

Friday, 26 August 2022

Random#18

 ख़ुद को गुनाहगार ठहरा ख़ुद को तस्सली दे रहा हूँ

 हर किसी के हिस्से का जुर्म मैं अपने सर ले रहा हूँ 


ये किस तरह का ताल्लुक था किसी का मेरे साथ

उसने दूर जाने को कहा और मैं और पास हो रहा हूँ 


मैं जानता था सब कुछ सौंप देने का अंज़ाम लेकिन 

ये क्या है कि मैं हर हर्फ़ से एक ग़ज़ल पिरो रहा हूँ 


यूँ नहीं है कि उसके जाने से टूट गया मैं

अब किसी का नहीं हो पाउँगा मैं इसलिए रो रहा हूँ


 

मैं हूँ तन्हाई है और यादों का ये बोझ

क्या बचा है मेरे पास किसके लिए संजो रहा हूँ 

Random#17

 कितना मुश्किल होता है खुद को माफ़ कर देना 

किसी को यूँ अपनी ज़िन्दगी से आज़ाद कर देना 


सब कुछ भूलकर भी सब कुछ याद करते रहना 

और यूँ अपनी पूरी ज़िन्दगी को नाशाद कर देना 


मुस्कराकर मिलना सबसे.......बातें करते रहना 

अपने बीते हुए कल को इस तरह मिस्मार कर देना 


अपनी सारी कोशिशों को टूटकर बिखरते हुए देखना 

कोई पूछे जब ग़म का सबब तो दरकिनार कर देना 


इस आज़ार से बाहर निकलना यूँ तो नहीं मुमकिन 

अगर मुमकिन हो तो यूँ करना मुझे बर्बाद कर देना 


Thursday, 4 August 2022

Random#16

एक लड़की है जिसके रूठ जाने से जीवन खाली सा लगता है 

सब लगता है बिखरा हुआ, वक़्त भारी सा लगता है 


याद आता है उसका चेहरा, उसकी आँखें , उसकी बातें 

कटता नहीं दिन काटने से, गुजरती ही नहीं रातें 


सोचता हूँ उसके गुस्से को कैसे शान्त कर पाउँगा 

सोचता हूँ कुछ भी करके आज उसे मनाऊँगा


वह जो बोलेगी हर बात उसकी मान लूँगा मैं 

हद से गुजर जाना है यह भी ठान लूँगा मैं 


जो भी हो वह मेरी है मुझे इतना नहीं सताएगी 

जब सामने आ जाऊँगा मैं वह गले आ लग जाएगी 


थोड़ा रोएगी, मारेगी मुझे फिर गले आ लग जाएगी 

कितना प्यार करती है मुझे, फिर मुझे बताएगी 


उसको अपनी बाँहों में भर माथें को चुम लूँगा मैं 

उसकी बाँहों में बँधकर आकाश झूम लूँगा मैं  

Thursday, 28 July 2022

Random#15

 ये फ़ासला जो हमारे दरम्यां रह गया है

छलक आये हैं आंसू पैमाना भर गया है

सिर्फ वक़्त है जो मुसल्सल चल रहा है 

मैं ठहर गया हूँ और तू भी ठहर गया है 

एक परिंदा ऊँचा उड़ने की ख़्वाहिश में 

अपना घर छोड़ किसी दूसरे शहर गया है  

सब कहते थे जिस शख़्स को पत्थर का 

वह पत्थर आज टूट के बिखर गया है

कभी चलता था जज्बातों का सिलसिला

अब लब खामोश हैं, अल्फ़ाज़ मर गया है  

Saturday, 9 April 2022

Random#14

 मंजिल कहाँ है, सफर क्या है?

उदास क्यों हो, हुआ क्या है?


सभी हैं बंद कमरों में यहाँ 

मैं पूछता हूँ माजरा क्या है?


सब पाकर भी ढूंढता है कुछ 

ऐसे में फिर मिला क्या है?


होता है ऐसे ही दुनिया में 

फिर किसी से भी गिला क्या है?


तुम्हे गुमाँ है अपनी वफ़ादारी का 

इन सारी वफाओं का सिला क्या है?

Random#13

 जब कभी हम तेरे शहर आए

अश्क़ आँखों में उतर आए 


लौट के यूँ तेरी याद आयी 

जैसे शाम के बाद सहर आए 


तेरी खुशबू ने यूँ छुआ मुझको

फूल हवाओं में बिखर आए 


ये गलियाँ यूँ बुलाती हैं मुझे 

जैसे लौट के कोई घर आए 


निगाहें फिरती रहती हैं दर-बदर 

तू कहीं दूर से नजर आए 


कौन?

 ये किसकी ताबीर पड़ गयी मुझपे, किसका तराना गुनगुनाता हूँ  

ये कौन है मेरे ख्यालों में, किसकी इबादत के गीत गाता हूँ 


किसको आवाज़ दे रहा हूँ मैं, कौन है जिसे बुलाता हूँ 

कौन रहता है साथ मेरे, किसकी यादों में खोया जाता हूँ 


ये किस तरह का रिश्ता है, किस ओर खींचा जाता हूँ 

बैठा हूँ अकेला जब कभी, किसको साथ अपने पाता हूँ 


सर झुकाया है जब कभी सजदे में, किसे खुदा से माँग लाता हूँ

किसके ख़्वाब के हिस्से अपने ख़्वाब में सजाता हूँ 


किसके तबस्सुम मे खोकर सारे दर्द भूल जाता हूँ 

किसकी आँखों की गहराई मे डूबा-डूबा जाता हूँ  


किसके आने की आहट से रातों को चौंक जाता हूँ 

सपना नहीं हकीकत है, ये कहानी जो मैं सुनाता हूँ 

Saturday, 28 August 2021

Random#11

अब ये प्यार, ये दर्द मुझसे दुबारा नहीं होगा 

हो गया भी गर तो सारा का सारा नहीं होगा 


तू बुला रहा था तो ले आ गया हूँ मैं तेरे पास 

बस इसलिए कि तेरा कोई सहारा नहीं होगा


मैं तुझसे बात भी कर लूँ तो अब वो बात नहीं 

मैं झूठ बोलूंगा और तुझे वो गवारा नहीं होगा


मैं आया हूँ पर लौट जाने की तैयारी के साथ 

पता है...तेरी तरफ से कोई इशारा नहीं होगा 


ये सब झूठ है जो अब तक कह रहा था मैं 

मैं तो कब्र से लौट आऊं तूने पुकारा नहीं होगा  

Sunday, 15 August 2021

Random#10

ये किसकी तासीर पड़ गई मुझपे, तराना किसका गुनगुनाता हूँ 

ये कौन है मेरी कहानी में.......किसकी इबादत के गीत गाता हूँ 

Wednesday, 11 August 2021

Random#9

अगर तू ख्वाब है तो ये रात यूँ ही रहने दे 

तू जा रहा है..जा..अपनी याद यूँ ही रहने दे 


मेरा तुझ पे इख़्तियार यूँ तो कुछ भी नहीं 

जो कुछ भी है मगर बात..बात यूँ ही रहने दे 


तेरी नवाज़िश का शौक अब मैं नहीं रखता 

गर बच गया हो लिहाज़..लिहाज़ यूँ ही रहने दे 


अब वो उल्फ़त वो अहद-ए-वफ़ा ना रही 

बच गया है जो दिल-ए-नाशाद..यूँ ही रहने दे 


तेरी क़ुर्बत में कहीं मैंने खो दिया खुद को 

तेरा तबस्सुम है मुझे याद..याद यूँ ही रहने दे 

Friday, 9 July 2021

गर बोलूँ तो रुस्वाई है

 टूट रहे हैं शाख से पत्ते, चल रही हवा पुरवाई है 

न बोलूँ  तो जुर्म है मेरा, गर बोलूँ तो रुस्वाई है 


बड़े दिनों की याद फिर लौट के वापस आई है

सोच रहा..है ये सपना, हकीकत है, परछाई है ?


होने को है क़यामत जैसे ले रहा वक्त अंगड़ाई है 

ऐसे मिलना भी क्या मिलना इससे अच्छी तो जुदाई है 


हँसना रोना सभी मना है, कैसी किस्मत पाई है?

जिस रूह से भाग रहा वो मुझमे ही सिमट आयी है 


भींग रही है धरती सारी......काली बदरी छाई है

बैठा हूँ महफ़िल में लेकिन सारी दुनिया की तन्हाई है 

Thursday, 1 July 2021

Random#8

अपने तस्सवुर में तुझे छू आने का सफ़र

कैसा दिलकश था तुझे पा जाने का सफ़र  


इससे पहले कि लोग हिज्र के किस्से कहे 

तय कर लेने दे वस्ल की राहत का सफ़र


न रोक मुझे लिख लेने दे किस्सा-ए-दिल 

अब ख़त्म होने को है मेरी चाहत का सफ़र 


मैं चाहता हूँ इन रास्तों पे कुछ निशान रहें

हो जाएँ आसां आते जाते राहगीरों का सफ़र


कोई पूछ रहा है कीमत इस नादानी का 

मैं कहता हूँ अच्छा रहा जैसा भी था सफ़र    



Sunday, 16 May 2021

Random#5

 ये फ़ासलां जो हमारे दरम्यान रह गया है 

छलक आये है आँशु, पैमाना भर गया है 


सिर्फ वक्त है जो मुसलसल चल रहा है 

मैं ठहर गया हूँ, और तू भी ठहर गया है 

Tuesday, 20 April 2021

Random#4

 ज़िन्दगी यूँ गुजर रही है


जैसे आइना फर्श पे बिखर रहा हो

लहूँ अश्क बनकर उतर रहा हो


परिंदा पिंजड़े में मचल रहा हो 

जंगल खुद अपनी आग में जल रहा हो 


बेवक्त मौसम बदल रहा हो 

कोई काटों पर जैसे चल रहा हो 


कोई गिर रहा हो और संभल रहा हो 

रात उजाले को निगल रहा हो 


रेत हाथों से फिसल रही हो 

बर्फ सर्दियों में पिघल रही हो 


ज़िन्दगी यूँ गुजर रही है 

जैसे वो ज़िन्दगी न होकर ग़ज़ल रही हो 

Thursday, 4 March 2021

Random#3

अगर अब मैं आइना देखूँ 

तो मुझे क्या दिखाई देगा?


कैद पड़े अश्कों को

इन आखों से कौन रिहाई देगा? 


यह जो मैं चीख रहा हूँ 

क्या वह दूर तक कहीं सुनाई देगा?


क्या मेरा ज़मीर मेरे बेगुनाह होने की

साफ लहजों में गवाही देगा?


Saturday, 27 June 2020

Random#2





हर शाम यह ख़ामोशी मुझसे कुछ इस कदर लिपट जाती है
धड़कने गर चलती भी रहे तो सांसे अटक जाती हैं 

मैं सोचता हूँ मेरी रूह मुझसे बिछड़कर किधर जाती है
शायद मेरी खामोशियों से तंग ख़ुदकुशी कर मर जाती है

ऐसा क्यों नहीं होता कि वो आकर मुझमें सिमट जाती है 
आती भी है शायद, पर आदतन रास्ता  भटक जाती है

हर रोज जिंदगी कुछ नया कुछ अजीब लिए आती  है
छीनकर मेरी सारी खुशियां किसी और को दिए जाती है

मश्वरा है उसका मेरे साथ जो वो निभाती चली जाती है
दर्द हो, शिकन हो, आहें बेशुमार आती है और बार-बार आती है 

Monday, 6 January 2020

Random#1

तुम्हारी बातें
जैसे जून के महीने में
खेतों में गिरी बारिश की बूँदे
और मैं
जैसे किसान के चेहरे
पर आयी मुस्कराहट
या फिर
दिसंबर के महीने में
सूरज ने धीमे
से जैसे हँस दिया हो
और मैं खिड़की को
खोल उस रोशनी
को पकड़ने की ताक में
देर तक ठहरा हुआ हूँ 

Thursday, 8 August 2019

खामोशियां


ये खामोशियां जो शहर के कोलाहल से ज्यादा डराती थी
कभी लम्बी रातों के सन्नाटे में तो कभी अकेले बंद कमरे में
रात को अचानक से यूँ उठकर बैठ जाना मुझे कुछ बतलाता था
या बाहर की तरह अंदर भी फैले इस सन्नाटें का आइना दिखाता था

मैंने जानने की कोशिश की थी क्या कभी...? पर जवाब नहीं मिला
शायद कुछ ऐसा ही हुआ होगा,कुछ सवालों के जवाब नहीं होते
हकीकत तो यह है कि बहुत सारे सवालों के जवाब नहीं है हमारे पास
कुछ चीजें हमने स्वीकार कर ली हैं और कुछ करवा दी गयी हैं

पर अब तो अच्छी लगने लगी हैं ये खामोशियाँ
रात को चुपके से उठकर पंखें बंद कर देता हूँ
नहीं जानता क्यों,शायद इस डर से कि रात का सन्नाटा कही भंग न हो जाये

जो कुछ भी हो पर इतना जरूर है अब जैसे जरूरत बन गयी हैं ये खामोशियाँ
नहीं रह पता उस जगह पर उस माहौल में जहाँ जंग है एक दूसरे को पराजित करने की
भले ही इसके लिए किसी मासूम को पैरों तले कुचलना पड़े
या फिर आपको अपना वास्तविक चेहरा हमेशा के लिए बदलना पड़े

अपनी सफलताओं असफलताओं का अवलोकन करना नहीं चाहता
वो चीज जो मेरे चेहरे पर मुस्कराहट लाती है मै वो करना चाहता हूँ
मै भागकर जल्दी से घर पहुंचना चाहता हूँ जहाँ सुकून के दो पल हैं मेरे पास

इस अजनबी शहर से बहुत दूर ले जाती हैं ये खामोशियाँ
और शायद यही जवाब है क्यों अच्छी लगने लगी हैं ये खामोशियाँ

 



Friday, 27 October 2017

देवदास

(Due thanks to owner of the photograph)



ये आब, ये रौशनी, ये आइना, ये आफ़ताब
सब के सब जाजिब (attractive) हैं माना
पर सच नहीं, और सच सिर्फ इतना है कि
इन सबसे अलग एक और दुनिया है
जिनमें रहता है एक गुमसुदा इंसान

शायद है गर्दिशों में गिरफ्तार
या फिर गुलदस्तों का मोहताज़
किसी अजीज के इंतिजार में 
टकटकी लगाए देखता है बार बार 

नहीं, किसी कि गवाही की जुस्तजू नहीं उसे
न ही वो है गुलों के शौक में गमदीदा
फिर ये ख़ुमार किसका है
वो खामोश क्यों है, ये अस्मार(weakness) किसका है 

खलिश(pain) है आँखों में
पर होठों पे मुस्कान भी है 
आदिल (honest ) इतना कि कहता है
सड़क के उस पर उसका एक मकान भी है

खबर है कि कोई कातिल है उसका
हालाँकि वो मरा नहीं है अभी 
क़यामत और भी देखनी है उसे
शायद दिल भरा नहीं है अभी 

ख़त्म हो जाये सिलसिले सारे 
अगर कबूल करे वो गुनाह अपना 
क्या खता नहीं ये कि 
अब उसी का न रहा है उसी का सपना 

अब न रहा है कोई जहीर
आब-ए-आइना (mirror) दिखाने वाला 
है कोई तो बस
आब-ए-तल्ख़(alcohal) पिलाने वाला 

न उसे शिकायत कोई, न किसी के खिलाफ है
गरज बस इतनी कि गिर्दाब (whirlpool) है हर तरफ 
और उसका क़ल्ब (wisdom) जो कहता है 
चश्म-ओ-चिराग(loved one) यही कहीं आसपास है 

आशियाने के बाहर कोई गश(unconscious)
फरियाद करती उसकी गुल 
जश्न मनाता सारा अंजुमन 
बस एक यही सच है और बाकी सब झूठ है, सब इत्तेफाक है  

Wednesday, 6 September 2017

और मैं सोचता हूँ कि मैं सच देखता हूँ



एक चेहरे पर हजार चेहरे
चलते सड़कों पर
चौराहों पर
अख़बार में
हर जगह 
और मैं सोचता हूँ कि मैं सच देखता हूँ 

मुस्कराते चेहरे पर बयां करती आँखें
हर हादसा
हर चोट
हर निशान
सब कुछ
और मैं सोचता हूँ कि मैं सच देखता हूँ

भीड़ में नजर आता वो अकेला शख़्स
हर महफ़िल में
सभाओं में
गाड़ियों में
हर जगह 
और मैं सोचता हूँ कि मैं सच देखता हूँ

एक खुशहाल परिवार पर समझौते 
पति-पत्नी के बीच
पिता-पुत्र के बीच
भाई-भाई के बीच
एक दूसरे से
और मैं सोचता हूँ कि मैं सच देखता हूँ 

एक चमकता घर, आलीशान गाड़ियां 
पर वो अँधेरा कमरा
बदसलूकी
जुल्म
अमानवीयता 
और मैं सोचता हूँ कि मैं सच देखता हूँ

मासूमियत, सादगी, खिलखिलाहट
पर वो इरादे
नफरत
ख़ामोशी
खंजर
और मैं सोचता हूँ कि मैं सच देखता हूँ 

Friday, 1 September 2017

"कविता और कविता"

डूबे हुए सृजन में अपने
सोचता हूँ फिर मन में मुड़कर
कविता और कविता की समानता पर



एक को मोड़ता है कवि अपनी भाषा से, भाव से

एक है मुड़ती समय के साथ खुद-ब-खुद
देती है गमगीन सोच कविता की हर कड़ीयाँ
सोच की सागर में लीन कविता हर घड़ीयाँ
कविता को पढ़ने से मिलती है सुधा प्यारी
लेकिन दूसरे के अन्तरहृदय के कपाट से निकलती है अश्रु सारी



कवि अपने कविता को बनाता है समय के वीभत्स नग्नता पर

सोचता हूँ फिर मन में मुड़कर कविता और कविता की समानता पर



एक प्रश्न पूछता हूँ अक्सर अपने से

जगा है क्या कोई कवि कभी सपने से?
जो तोड़-तोड़ है शब्दों को खंघारता
फिर चुन-चुन है उन्हें सवाँरता
और यह समाज भी अब हो गया है निर्मम कवि
देख-देख हर माप पर चुनना चाहते है सभी



अभी दुर्भाग्य है ऐसी कई कविता सी बालिकाओ के

है न कोई खास बात इन सैकड़ों कविताओं में
जो कोसती है भाग्य अपने समाज की हकीकत और मेरी कविताओं पर
सोचता हूँ फिर मन में मुड़कर कविता और कविता की समानता पर








Monday, 7 August 2017

शायद

भीड़ है ये कुछ ख्वाहिशों की
जिन्हें हमेशा पकड़ना चाहता हूँ मैं
देखना चाहता हूँ कि आखिर
क्या है इनमें, जो अक्सर मैं खींचा चला आता हूँ इनकी तरफ 
कुछ तो बात होगी
कुछ न भी सही, एक बार मुलाकात तो होगी
भ्रम का टूटना भी जरूरी है
ख्वाहिशों का बोझ हल्का रखने के लिए 
फिर ख्याल आता है 
ख्याल आता है या ये भी मेरा वहम है
पता नहीं
खैर तो ऐसा है कि मैं सोचता हूँ कभी कभी
क्या हो अगर सारे सपने सच्चे हो जाये हमारे 
तो क्या फिर भी ऐसी ही बेचैनी रहेगी तब भी
और कुछ पाने की, कुछ नए सपने 
पता नहीं, शायद
ये शायद भी बड़ा अजीब शब्द है न
कभी भरोसा ही नहीं होने देता
भरोसा टूटने के लिए ही बना होता है, शायद
फिर शायद
क्या कर सकते हैं 
कुछ चीजें हमारे वश की बाहर की चीजें होती हैं
कोई अधिकार नहीं इन पर
या होता हैं क्या, पता नहीं, शायद 
एक चीज थी जिस पर कभी अधिकार था मेरा
ऐसा लगता था जैसे किसी का हक़ ही नहीं मेरे अलावा उस पर
पर ये भी वहम निकला, मेरे बाकी सारी ख्वाहिशों की तरह
जो मिल जाने के बाद वैसी नहीं होती जैसी कल्पना थी हमारी
कैसी होती हैं फिर 
हमारी कल्पना से थोड़ी कम, और कम, थोड़ा कम
पता नहीं, शायद
एक नईं ख्वाहिश हैं मेरी
और मैं सोचता हूँ कि ये मेरी कल्पना से बढ़ कर होगी
होगी क्या?
पता नहीं, देखते हैं, शायद 

Saturday, 18 March 2017

ये बर्फ पिघलते क्यों हैं?
क्यों छोड़ देते हैं जिद अपनी 
थोड़ी सी गर्मी के आगे?

शायद परिवर्तन ही संसार का नियम है
या फिर सीखा ही नहीं इन्होंने 
बेवजह हठ करना और पैदा कर देना
दरार रिश्तों के बीच में

Sunday, 12 March 2017

पता नहीं क्यों

पता नहीं क्यों पर जब कभी भी मैं  सोचता हूँ तुम्हे 
एक अजीब सी मुस्कान चली आती है चेहरे पे 
चाहा हैं बहुत बार, दूर रखूँ, तुम्हारे चेहरे,अपनी आँखों से
पर हर बार तोड़ा है इस वायदे को मैंने, पता नहीं क्यों 

पता नहीं क्यों, हर बात अच्छी लगती है मुझे तुम्हारी  
तुम्हारे सवालात, हमारे मुलाकात, सब अच्छे लगते हैं मुझे 
और चाहा हैं जब कभी मैंने कि न सोचूँ तुम्हारे बारे में 
बेचैनियों का एक सिलसिला चल पड़ा हैं साथ, पता नहीं क्यों 

पता नहीं क्यों, जब कभी भी चाहा हैं गुस्सा होना मैंने 
सोचा कि नाराज़ होकर चला जाऊँ दूर कही तुमसे 
और न आऊं लौटकर वापिस कभी फिर इस जगह 
नम आँखों ने रोका हैं मुझे हर बार, पता नहीं क्यों 

पता नहीं क्यों आज जब सब कुछ हैं मेरे पास
फिर भी क्यों, कुछ भी न होने का अहसास है जैसे
लगता है जैसे कुछ है ही नहीं, पता नहीं क्यों  



Thursday, 23 February 2017

आरजूओं का फलसफां, मैं कैसे तुम्हें बता दूँ 
बरसों की ये चाहत, मैं कैसे तुझसे जता दूँ 
मासूमियत, वो सादगी, वो खिलखिलाहट हर बात पर
जो गूंजती हों हर पहर, मैं कैसे इन्हें भुला दूँ

बन गयी हो जो जरूरत हर वक्त, बेवक्त की 
ऐसी हैं कुछ सिलवटें, मैं किस तरह मिटा दूँ 
दर्द की जो दास्तान, सुपुर्दें खाक हो चुकी 
उन दास्तानों का निशान, मैं कैसे तुम्हें दिखा दूँ 

अश्कों का ये सिलसिला, जो चल रहा है दर-बदर 
हर किसी के सामने, मैं कैसे इन्हें चुरा लूँ
सिसकियों की अर्जियां, खामोशियों का ये सफर 
फैली हुई जो दूर तक, मैं किस तरह छुपा लूँ 

Sunday, 19 February 2017

चाहा मैंने भी वही हैं जो तुमने
माँगा मैंने भी वही है जो तुमने 
ग़लतफ़हमियाँ रह गयी दरम्यां शायद 
मंजूर हो जिंदगी को कुछ नया शायद 

Sunday, 22 January 2017

जनतंत्र दिवस

कभी कभी टूटे हुए कांच की तरह सपने भी बिखर जाते हैं,
हम जो हैं वही रहते है और अचानक से हालात बदल जाते हैं|
तो क्या यह जरूरी है कि हर वक्त हालात का रोना रोया जाये,
ऐसा नहीं हो सकता कि कुछ नए सपनों का बीज बोया जाये|
भुलाकर सारी खामियों को,नाकामियों को,परेशानियों को,
जिंदगी को जैसे डायरी कि किसी नए पेज पर लिखा जाये|
जो जिम्मेदार थे,कसूरवार थे तोड़ने के लिए सारे सपने हमारे;
अपनी सारी उन हरकतों से,नादानियों से सबक सीखा जाए|
ऐसा मुमकिन तो नहीं कि सारे सपने हकीकत में बदल जाएँ,
फासले मिट जाए सारे दरम्याँ और सपने ही हकीकत बन जाएँ
पर अच्छा लगता है अपने सपनो को हकीकत बनते देखकर
जैसे कुम्हार को अच्छा लगता है मिटटी को दीपक बनते देखकर
खुश होना कोई गुनाह तो नहीं,फिर सपने देखना भी गुनाह नहीं है
नए सपनो को जगह देना भी,जब पुराने सपनो के लिए पनाह नही है
हर नागरिक का सपना था जनतंत्र जो सच्चे अर्थों में उनका अपना हो
स्वतंत्रता,सुरक्षा,सुविधाएँ,सुशाशन सब हकीकत हों न कि कोई सपना हो
पर सब सपने एक एक कर टूटते चले गए,जनतंत्र कहीं ग़ुम हो गया
और इस पूरे जनतंत्र कि जगह भारतीय जनतंत्र दिवस ने ले लिया
एक ऐसा दिन जब झूठा विश्वास दिलाने का अभ्यास किया जाता है,और
सालभर की नाकामियों को तिरंगे के नीचे ढकने का प्रयास किया जाता है
और उसी तिरंगे के नीचे कुछ अनाथ,कुछ विधवाएँ.कुछ ऐसी महिलाएं
जिनकी इज्जत लूट ली गयी हैं,एकटक निहारते है जैसे ये सारा षड्यन्त्र
आँखों में सपने और दिल में सच्ची उम्मीद लेकर झूठे वादों पर तालिया
बजाते हुए होठों से बुदबुदाते हुए जैसे मांग रहे हों एक सच्चा जनतंत्र

Sunday, 25 September 2016

कल्पना


तुम हकीकत नहीं हो, पता है मुझे 
पर हर बार मैं तुमसे मिलता रहा हूँ 
तुम्हारी तस्वीर, मेरा तस्स्वुर 
बस यूँ ही कुछ ख्वाब बुनता रहा हूँ 

मैं खुद से अलग खो गया हूँ कहीं 
इस कदर हर बार तुमको ढूंढता रहा हूँ
लड़खड़ाना, गिरना, उठना और चलना 
जिंदगी, बहुत कुछ सीखता रहा हूँ 

कभी खुद जान नहीं पाया तुम्हे सलीके से
हालाँकि कई दफ़ा वही से गुजरता रहा हूँ 
एक हुनर है महफूज़ वर्षो से 
थोड़ा जीता रहा हूँ थोड़ा मरता रहा हूँ

सारा इल्ज़ाम मढ़ दिया है ज़माने ने सर मेरे
जबकि इस जुर्म में मैं सिर्फ हमसफ़र रहा हूँ 
यूँ आग में जलने का शौक किसे है
हँसी होंठो पर और आहिस्ता सिसकता रहा हूँ    


Monday, 5 September 2016

अदला बदली भूमिकाओं की

अदला बदली भूमिकाओं की(एक प्राइमरी शिक्षक का दर्द)


अब जाता बारिश का महीना है
धूप में आती है कभी एक बौछार
और सो जाती हैं बूँदे सड़क की गर्दिश में
लगता है किसानो के चेहरे पर जैसे गिरा दी गई हो गर्म कोलतार




समय भी कुछ खुश्क है
धूप का छाता लगाये हुए और हवा के पंखे से
मैं भी जाता हूँ गिनती गिनाने अपनी बिना मोटर वाली साईकिल से

उस जगह पर जो हैं मेरे काम की जगह
है असल में एक कान्वेंट विद्यालय वह
रास्ते में एक दूर्गा मंदिर है जहाँ जमावड़ा रहता है लोगो का किसी फ़िराक में
पूजा करने के लिए किसी को आबाद या बर्बाद करने की ताक में

यही वह समय है जब नीम की छाह में गप्पे लड़ाना कर्त्तव्य समझा जाता है
और इस जर्जर मंदिर को विचारों की जर्जरता से ढकने का प्रयास किया जाता है
आगे पहुँचकर मैं पाता हूँ एक बाजार जो खासकर नशे का अड्डा है
फिर उतरता हूँ मैं अपनी साईकिल से,क्योंकि पास ही में एक गड्ढा है

है वह कुछ दुकानें चाय की ,पान की भी हो जाती है पूरी जरूरते खासमखास
पर जमावड़ा रहता है उन चार-पाँच दुकानों पर जहाँ बोतले बिकती हैं जनाब
फिर मिलता हूँ मैं अपने छात्रों से
जो हमारी आँखों को गर्द से ढकने के लिए प्रणाम करते हैं
जिन्हे कुछ मतलब नहीं होता ज्ञान की बातों से

ये छात्र बस छात्र रहना चाहते हैं
और धोखे को अपनी कुशलता का दर्प मानते हैं

अब सह शिक्षकों से होता है नमस्ते सलाम
कनिष्ठ वरिष्ठ में रहती है औपचारिकता मात्र
और पेड़ की छाह में मैं बुलाता हूँ नौनिहालों को
जो ले आ धमकते हैं कहानी की किताब

पढाई नहीं फरमाइश होती हैं जैसे शिक्षक कोई कलाकार हो
माननी होती है हर बात उनकी जैसे आप दूकानदार हों
और वह ठेले वाला भी काम कहाँ
जिसे लंच के वक्त का रहता है इंतजार
छात्रों पर बगुलें की तरह निशान लगायें चिल्लाता जाता है बार-बार
इसी आशा में हमारी फरमाइश भी है करता पूरी
यह जानते हुए भी की चवन्नी नहीं मिलने वाली

मैं स्वयं को खोजने की कोशिश करता हूँ
क्या मैं अपना वजूद व् वसूल खो चूका हूँ?
क्या मैं जो हूँ ,इसी लायक हूँ
या मुझे और भी बहुत कुछ करना है
जो जिस काम के लिए बना है
वो वही काम क्यों नहीं करता है?

हमने कर ली है अपनी भावनाओं से हेराफेरी
या हो गई है अदला बदली समय के साथ भूमिकाओं की

Monday, 22 August 2016

कुछ शिकायते, कुछ नाराजगी, थोड़ी हसरते भी

माना दरम्यान कुछ गीले हैं, कुछ शिकवे भी
कुछ मजबूरियाँ मेरी, कुछ तेरी दिक्कतें भी 
कुछ शिकायते, कुछ नाराजगी, थोड़ी हसरते भी 
कुछ वादें, कुछ कसमें, थोड़ी मुहब्बतें भी 


पर पता है तुझे पास अब भी है मेरे ढेर सारी यादें तेरी 

कुछ बिताये पल, कुछ खुशियाँ और ढेर सारी बातें तेरी
वो मुस्कराहट, थोड़ा गुस्सा और वो मासूम आँखे तेरी 
मेरा मिलना तुझसे हर बार और वो बेचैन सांसें मेरी 


एक शाम, कुछ ख्वाब और अनगिनत कहानियाँ

सुनसान धड़कन, बेचैन रूह और हजारों निशानियाँ
मेरी आरजू, तेरे चेहरे और वक्त की बेईमानियां
बेताब दिल, सूनी आँखें और भींगी सी तनहाइयाँ


अजब सा रिश्ता है ये अजब सा फ़साना है 

कुछ अनसुलझे सवाल, मीलों का सफर और चलते जाना है 
जुस्तजू मेरी, गुजारिश मेरी पर जवाब तुझसे आना है 
हसीं मंजर, घने बादल और आशियाँ तुझे बनाना है 


Sunday, 17 July 2016

कुछ कहना है तुमसे

कुछ कहना है तुमसे
सुन सकोगे, शायद नहीं
फिर भी कहना चाहता हूँ
एक आखिरी कोशिश

सुन न पाओ तो इशारा करना बस
चला जाऊंगा मैं वापस मुड़कर
संवेदनाओं को वापस दफ़न कर वहीं
जहाँ पड़ी हुई थी वर्षो से गुमसुम

तुम कहते न थे बहुत बोलते हो तुम
अब खामोश रहना सिख लिया है मैंने
पर पता नहीं क्यों आज जी मैं आया कि
कह दूँ वो सारी चीजें जो वर्षो से कहना चाहता था

न कह पाया तो भी अफ़सोस नहीं होगा
चलो एक बार हिम्मत तो की थी कहने की
आज शब्दों को बिना चुने ही बोलूँगा
जो भी है कहने को, बस बेधड़क

न सुनो तो भी भरोसा दिलाना सुनने का
इतना काफी होगा मेरे लिए, जी हल्का हो जायेगा

कहाँ से शुरू करू, बहुत सारी बाते हो गयी है कहने को
याद है तुम्हे जब पहली बार मिले थे हम, या फिर आखिरी

आखिरी भी नहीं, अरे जब कहा था तुमने कि
वापस जाने के बाद भूल तो नहीं जाओगे मुझे
अच्छा छोड़ो याद है वो दिन जब हम
घर वापस आ रहे थे साथ में और बारिश शुरू हो गयी थी
घंटों बातें की थी हमने पेड़ के नीचे छिपकर
नहीं, अच्छा ये तो याद होगा, जब बैठे रहे थे छत पर पूरी रात 
कैसे हमने एक दूसरे को अपने सपने बताये थे
हमें क्या बनना है, क्या करना है सब कुछ

कितनी जल्दी भूल जाते हो न सारी चीजें
बचपन से लेकर अभी तक वैसे के वैसे हो
मैं ही बदल गया हूँ शायद, चीजों के साथ यादें
सहेजना भी शुरू कर दिया था मैंने जाने के बाद

वैसे ही रहना जैसे मिले थे हम पहली बार
फिर कभी मुलाकात हो गर किसी मोड़ पर
चलों वापस दफ़न करता हूँ सारी संवेदनाओं को
यादों की चादर के साथ फिर उसी जगह पर

किसी को भी किसी के जिंदगी में अचानक यूँ दखल देना का हक़ नहीं होना चाहिए
तुम अच्छे हो, खुश हो, अच्छा लगा जान कर
चलता हूँ वापस जहाँ से आया था बेपनाह उम्मीदों के साथ
बड़ी लंबी जिंदगी है, बेशुमार समय भी, सुना है समय सबसे अच्छी दवा है किसी भी मर्ज की

जब उससे दूर जाता हूँ

वो शाम, जो हर शाम के बाद आती है
तमाम कोशिशों के बाद भी उदास आती है
फिर चांदनी को ओढ़े हुए रात आती है
जैसे मुद्दतों के बाद उसकी याद आती है

उस याद की परतों से मैं तकिया बनाता हूँ
चाँद लफ्ज उसकी तारीफों के गुनगुनाता हूँ
बिना मर्जी के उसके रिश्ते मैं ढूंढ लाता हूँ
कुछ ऐसे गुजरती है रात जब उससे दूर जाता हूँ

Saturday, 2 January 2016

उम्मीद


ये जो तूने अपने चेहरे को नए चेहरे से छिपा रखा है
अब तू ही बता यहाँ,भरोसा टूटने के सिवा क्या रखा है ?
माना जालिम है दुनिया,और ये नया चेहरा भी जरूरी है
गम तो ये है कि मेरे सिवा हर शख्स को हमदर्द बना रखा है
मुमकिन है कि कुछ मजबूरियाँ रही होंगी उन दिनों
पर ऐसा भी तो नहीं कि तूने वाकया वर्षो से बता रखा है

आँखों का भींग जाना ज्यादा अच्छा है, खामोस होने से
क्या हुआ?क्यों जुबां पे इस कदर ताला लगा रखा है?

गरीब लोग हैं हम, मुस्कराहट के सिवा क्या देंगे
फिर भी इसी उम्मीद पर, आज की रात दरवाजा खुला रखा है||

Wednesday, 21 October 2015

बिहार चुनाव

आज सर्द हवाओं का असर कुछ ज्यादा लगता है
हलचल मेरे गावं में,शहर से कुछ ज्यादा लगता है

दूध से सफ़ेद कपड़ें,सर पर टोपियां और हाथों में झण्डें
हुजूर साइकिलें कम और मोटर कार कुछ ज्यादा लगता है

गर्म चादर,कुछ पैसे और दो चार बोतलें दे गया है हाथों में जनाब
आज ठण्ड कुछ कम लगेगी,मुझे तो वो मददगार ज्यादा लगता है

चर्चे हैं हर तरफ अर्जियां मेरी भी सुनी जाएँगी अब बस्ती में
बेटा मेरा शिक्षक कम और हुजूर का खिदमतगार ज्यादा लगता है




Thursday, 28 May 2015

नई शुरुआत

आंसू गिराये होंगे कई आँखों से हमने
पर हमारा ये इरादा कतई नहीं था
चलो मान लिया सारा कसूर था मेरा
पर मैं दोस्त था तुम्हारा,मुद्दई नहीं था

कि तुम हर बात को बखूबी समझ जाते हो
सोचता हूँ अब कि वो भरम था मेरा
इतने एहसान है कि आँखे नहीं मिलती तुमसे
वरना इन आँखों में तुम भी तो अश्क़ लाते हो

चलो एक नए रिश्ते कि शुरुआत करते हैं
चलते है दो कदम साथ में और चार बात करते हैं
मुमकिन है कि फ़ासले दरम्यान कुछ कम हो जाएँ
तुम और मैं मिलकर सायद हम हों जाएँ  

Tuesday, 5 May 2015

चंद लफ़्ज

"दर्द की हद थी शायद वो,कि
एक झटके में सारा डर जाता रहा
वो मेरी जान लेकर जाते रहे
और मैं यूँ ही खड़ा मुस्कराता रहा"

"मुझपे मेरा गाँव छोड़ आने का इल्जाम न दो
मैं अब भी सपने में मिट्टी के महल बनाता हूँ
कभी आंसू ,कभी मुस्कान ,कभी वो किये हुए वादे
खोकर सपने में कहीं,मैं हकीकत भूल जाता हूँ"

"रिश्ते भी महँगे हो गए हैं,बाजार में कीमत की तरह
टूटने का डर बना रहता है हर वक्त , मिट्टी के दीपक की तरह
फ़ासले बढ़ गए हैं दिलों के दरम्यान कुछ इस कदर
जैसे हम सुलग रहे हों, और हर कोई मौजूद है मगर पावक की तरह"


"मैं कैसे ये कह दूँ तुम्हारी चाहत नही है
मुझे उस खुदI की इजाजत नही है
डांट दो बस एक बार यही समझकर
मैं बच्चा हूँ अब भी, सरारत नई है"

"खोकर रोज नींद अपनी तुम्हे चैन से सोने दिया
पोंछे हर आँशु गिरने से पहले,कभी रोने न दिया
और तुमने उनके प्यार का क्या खूब सिला दिया
अपने दोस्तों से तूने,उन्हें घर का नौकर बता दिया"

"चाँद की भी कभी ऐसी हालत हो जाती है
अमावस हो तो चाँदनी चली जाती है
सियासत का भी खेल कुछ ऐसा ही है दोस्तों
हद गुजर जाये तो बगावत चली आती है"

"झोपड़ियां खाली करो,महल बनानी है;उनका फ़रमान आया है "
हम तो चार पैसे न दे पर फिर भी चलो;दरम्यान ईमान आया है" 
इस बदहाली में भी हँस पड़ता हूँ उनके इस ""गंभीर"" रवैये पर 
फिर सर झुकाता हूँ सोचकर, चलो भगवान न सही शैतान आया है"

Random #38

 इतना तो सचमुच में समझदार बनना था  मुझे भी थोड़ा बहुत अदाकार बनना था  लेकर ढोते हुए सभी जुर्मों को सर अपने  कभी तो सचमुच में गुनाहगार बनना था...