जब कभी हम तेरे शहर आए
अश्क़ आँखों में उतर आए
लौट के यूँ तेरी याद आयी
जैसे शाम के बाद सहर आए
तेरी खुशबू ने यूँ छुआ मुझको
फूल हवाओं में बिखर आए
ये गलियाँ यूँ बुलाती हैं मुझे
जैसे लौट के कोई घर आए
निगाहें फिरती रहती हैं दर-बदर
तू कहीं दूर से नजर आए
इतना तो सचमुच में समझदार बनना था मुझे भी थोड़ा बहुत अदाकार बनना था लेकर ढोते हुए सभी जुर्मों को सर अपने कभी तो सचमुच में गुनाहगार बनना था...
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