Showing posts with label life. Show all posts
Showing posts with label life. Show all posts

Friday, 1 September 2017

"कविता और कविता"

डूबे हुए सृजन में अपने
सोचता हूँ फिर मन में मुड़कर
कविता और कविता की समानता पर



एक को मोड़ता है कवि अपनी भाषा से, भाव से

एक है मुड़ती समय के साथ खुद-ब-खुद
देती है गमगीन सोच कविता की हर कड़ीयाँ
सोच की सागर में लीन कविता हर घड़ीयाँ
कविता को पढ़ने से मिलती है सुधा प्यारी
लेकिन दूसरे के अन्तरहृदय के कपाट से निकलती है अश्रु सारी



कवि अपने कविता को बनाता है समय के वीभत्स नग्नता पर

सोचता हूँ फिर मन में मुड़कर कविता और कविता की समानता पर



एक प्रश्न पूछता हूँ अक्सर अपने से

जगा है क्या कोई कवि कभी सपने से?
जो तोड़-तोड़ है शब्दों को खंघारता
फिर चुन-चुन है उन्हें सवाँरता
और यह समाज भी अब हो गया है निर्मम कवि
देख-देख हर माप पर चुनना चाहते है सभी



अभी दुर्भाग्य है ऐसी कई कविता सी बालिकाओ के

है न कोई खास बात इन सैकड़ों कविताओं में
जो कोसती है भाग्य अपने समाज की हकीकत और मेरी कविताओं पर
सोचता हूँ फिर मन में मुड़कर कविता और कविता की समानता पर








Sunday, 22 January 2017

जनतंत्र दिवस

कभी कभी टूटे हुए कांच की तरह सपने भी बिखर जाते हैं,
हम जो हैं वही रहते है और अचानक से हालात बदल जाते हैं|
तो क्या यह जरूरी है कि हर वक्त हालात का रोना रोया जाये,
ऐसा नहीं हो सकता कि कुछ नए सपनों का बीज बोया जाये|
भुलाकर सारी खामियों को,नाकामियों को,परेशानियों को,
जिंदगी को जैसे डायरी कि किसी नए पेज पर लिखा जाये|
जो जिम्मेदार थे,कसूरवार थे तोड़ने के लिए सारे सपने हमारे;
अपनी सारी उन हरकतों से,नादानियों से सबक सीखा जाए|
ऐसा मुमकिन तो नहीं कि सारे सपने हकीकत में बदल जाएँ,
फासले मिट जाए सारे दरम्याँ और सपने ही हकीकत बन जाएँ
पर अच्छा लगता है अपने सपनो को हकीकत बनते देखकर
जैसे कुम्हार को अच्छा लगता है मिटटी को दीपक बनते देखकर
खुश होना कोई गुनाह तो नहीं,फिर सपने देखना भी गुनाह नहीं है
नए सपनो को जगह देना भी,जब पुराने सपनो के लिए पनाह नही है
हर नागरिक का सपना था जनतंत्र जो सच्चे अर्थों में उनका अपना हो
स्वतंत्रता,सुरक्षा,सुविधाएँ,सुशाशन सब हकीकत हों न कि कोई सपना हो
पर सब सपने एक एक कर टूटते चले गए,जनतंत्र कहीं ग़ुम हो गया
और इस पूरे जनतंत्र कि जगह भारतीय जनतंत्र दिवस ने ले लिया
एक ऐसा दिन जब झूठा विश्वास दिलाने का अभ्यास किया जाता है,और
सालभर की नाकामियों को तिरंगे के नीचे ढकने का प्रयास किया जाता है
और उसी तिरंगे के नीचे कुछ अनाथ,कुछ विधवाएँ.कुछ ऐसी महिलाएं
जिनकी इज्जत लूट ली गयी हैं,एकटक निहारते है जैसे ये सारा षड्यन्त्र
आँखों में सपने और दिल में सच्ची उम्मीद लेकर झूठे वादों पर तालिया
बजाते हुए होठों से बुदबुदाते हुए जैसे मांग रहे हों एक सच्चा जनतंत्र

Monday, 5 September 2016

अदला बदली भूमिकाओं की

अदला बदली भूमिकाओं की(एक प्राइमरी शिक्षक का दर्द)


अब जाता बारिश का महीना है
धूप में आती है कभी एक बौछार
और सो जाती हैं बूँदे सड़क की गर्दिश में
लगता है किसानो के चेहरे पर जैसे गिरा दी गई हो गर्म कोलतार




समय भी कुछ खुश्क है
धूप का छाता लगाये हुए और हवा के पंखे से
मैं भी जाता हूँ गिनती गिनाने अपनी बिना मोटर वाली साईकिल से

उस जगह पर जो हैं मेरे काम की जगह
है असल में एक कान्वेंट विद्यालय वह
रास्ते में एक दूर्गा मंदिर है जहाँ जमावड़ा रहता है लोगो का किसी फ़िराक में
पूजा करने के लिए किसी को आबाद या बर्बाद करने की ताक में

यही वह समय है जब नीम की छाह में गप्पे लड़ाना कर्त्तव्य समझा जाता है
और इस जर्जर मंदिर को विचारों की जर्जरता से ढकने का प्रयास किया जाता है
आगे पहुँचकर मैं पाता हूँ एक बाजार जो खासकर नशे का अड्डा है
फिर उतरता हूँ मैं अपनी साईकिल से,क्योंकि पास ही में एक गड्ढा है

है वह कुछ दुकानें चाय की ,पान की भी हो जाती है पूरी जरूरते खासमखास
पर जमावड़ा रहता है उन चार-पाँच दुकानों पर जहाँ बोतले बिकती हैं जनाब
फिर मिलता हूँ मैं अपने छात्रों से
जो हमारी आँखों को गर्द से ढकने के लिए प्रणाम करते हैं
जिन्हे कुछ मतलब नहीं होता ज्ञान की बातों से

ये छात्र बस छात्र रहना चाहते हैं
और धोखे को अपनी कुशलता का दर्प मानते हैं

अब सह शिक्षकों से होता है नमस्ते सलाम
कनिष्ठ वरिष्ठ में रहती है औपचारिकता मात्र
और पेड़ की छाह में मैं बुलाता हूँ नौनिहालों को
जो ले आ धमकते हैं कहानी की किताब

पढाई नहीं फरमाइश होती हैं जैसे शिक्षक कोई कलाकार हो
माननी होती है हर बात उनकी जैसे आप दूकानदार हों
और वह ठेले वाला भी काम कहाँ
जिसे लंच के वक्त का रहता है इंतजार
छात्रों पर बगुलें की तरह निशान लगायें चिल्लाता जाता है बार-बार
इसी आशा में हमारी फरमाइश भी है करता पूरी
यह जानते हुए भी की चवन्नी नहीं मिलने वाली

मैं स्वयं को खोजने की कोशिश करता हूँ
क्या मैं अपना वजूद व् वसूल खो चूका हूँ?
क्या मैं जो हूँ ,इसी लायक हूँ
या मुझे और भी बहुत कुछ करना है
जो जिस काम के लिए बना है
वो वही काम क्यों नहीं करता है?

हमने कर ली है अपनी भावनाओं से हेराफेरी
या हो गई है अदला बदली समय के साथ भूमिकाओं की

Tuesday, 5 May 2015

चंद लफ़्ज

"दर्द की हद थी शायद वो,कि
एक झटके में सारा डर जाता रहा
वो मेरी जान लेकर जाते रहे
और मैं यूँ ही खड़ा मुस्कराता रहा"

"मुझपे मेरा गाँव छोड़ आने का इल्जाम न दो
मैं अब भी सपने में मिट्टी के महल बनाता हूँ
कभी आंसू ,कभी मुस्कान ,कभी वो किये हुए वादे
खोकर सपने में कहीं,मैं हकीकत भूल जाता हूँ"

"रिश्ते भी महँगे हो गए हैं,बाजार में कीमत की तरह
टूटने का डर बना रहता है हर वक्त , मिट्टी के दीपक की तरह
फ़ासले बढ़ गए हैं दिलों के दरम्यान कुछ इस कदर
जैसे हम सुलग रहे हों, और हर कोई मौजूद है मगर पावक की तरह"


"मैं कैसे ये कह दूँ तुम्हारी चाहत नही है
मुझे उस खुदI की इजाजत नही है
डांट दो बस एक बार यही समझकर
मैं बच्चा हूँ अब भी, सरारत नई है"

"खोकर रोज नींद अपनी तुम्हे चैन से सोने दिया
पोंछे हर आँशु गिरने से पहले,कभी रोने न दिया
और तुमने उनके प्यार का क्या खूब सिला दिया
अपने दोस्तों से तूने,उन्हें घर का नौकर बता दिया"

"चाँद की भी कभी ऐसी हालत हो जाती है
अमावस हो तो चाँदनी चली जाती है
सियासत का भी खेल कुछ ऐसा ही है दोस्तों
हद गुजर जाये तो बगावत चली आती है"

"झोपड़ियां खाली करो,महल बनानी है;उनका फ़रमान आया है "
हम तो चार पैसे न दे पर फिर भी चलो;दरम्यान ईमान आया है" 
इस बदहाली में भी हँस पड़ता हूँ उनके इस ""गंभीर"" रवैये पर 
फिर सर झुकाता हूँ सोचकर, चलो भगवान न सही शैतान आया है"

Monday, 16 March 2015

रिश्ता


होठ सुर्ख थे जेठ की दोपहर की दीवार की तरह
अश्कों से बारिश भी जिसे भींगा नहीं पाया
चीख निकली थी पर गले तक अटकी 
इन फैले हाथों को थामने कोई हाथ नहीं अाया
मैं खड़ा रहा देर तक इंतजार में किसी के 
सब आये पर कोई पास नहीं आया 
कभी अच्छी लगते थे जीवन के हर एक पल
और आज पूरा दिन रास नहीं आया
मुझे कोई भी शोर जगा नहीं पाया
इतना गहरा डूबा की कोई बचा नहीं पाया 
हालाँकि उजाला हुआ था थोड़ी देर के लिए
पर ऐसा भी नहीं की रास्ता दिखा पाया
आज रिश्तों के सब मायने बदल गए,मेरे लिए 
जिसके आने की उम्मीद न थी,वो आया 
देखा था मैंने उसे शायद पहली बार,अनजान था वो
पर क्या उसने सच्चे रिश्ते का फर्ज नहीं निभाया?

Friday, 6 March 2015

परिवर्तन


ये इतफ़ाक था कि होता हुआ हादसा टल गया
वरना सूरज पागल न था ,जो शाम से पहले ढल गया
उसने कसम खाई थी इंतजार की रात तक
रात जल्दी हुई और उसका दिल बदल गया 

उसने सोचा था कि शायद यह आखिरी दिन है 
उसने आग लगाई और पिछला पूरा किस्सा जल गया 
हालाँकि ये देखकर कदम लड़खड़ाये थे उसके
हाँ ये इतेफाक ही था कि वो फिर खुद ही संभल गया 

फिर कुछ न याद रहा उसे फ़साना अतीत का
एक जूनून बस आगे बढ़ने का,जीत का
जिसकी उम्मीद न थी किसी को वो कुछ ऐसा कर गया
ये इतफ़ाक था कि होता हुआ हादसा टल गया

Tuesday, 3 March 2015

गुजारिश

गर है ख़ुदा तो फिर दिखाई क्यों नहीं देता ?
वो आवाज़ देता है मुझे सुनाई क्यों नहीं देता?
हलक तक साँस अटकी है,मुझे मौत आती है
गर वो दुश्मन है मेरा बधाई क्यों नहीं देता?
गला रुँधा है उसका भी,आँखे नम हैं उसकी भी
इन अंतिम लम्हों में वो विदाई क्यों नहीं देता
शायद कुछ गीले थे दरम्यां,कुछ बातें करनी थी
गर अहम नहीं हैं मुझमे,उसे बुला ही क्यों नहीं लेता ?
छोटी बात थी कितनी ,मुझे महसूस होता है
मेरी इन भावनाओं को बता ही क्यों नहीं देता?
शायद वो पास है मेरे,फासला क्यों है इतना फिर
दोनो की चाहतों को एक बना ही क्यों नहीं देता?
गुजरे हुए हर एक लम्हें याद आते हैं
मेरी परछाई की तरह ही मेरे साथ जाते हैं
कि मैं आँखें मूँद लेता हूँ,और सफर को जाता हूँ
तू दोस्त हैं मेरा दिखाई क्यों नहीं देता ?
माफ़ कर देना मुझे,वो जज्बात थे मेरे
हर पल मुझे उस बात का अफ़सोस रहता था
इतना भी न कर सका मैं कि कह सकूँ तुमसे
गर कर दिया हैं माफ़,जता ही क्यों नहीं देता?
इन अंतिम लम्हों में तुम्हे दो शब्द लिखता हूँ
तुम पढोगे मेरे लब्जों को मुझे पता नहीं
गर पढोगे लेकिन तो फिर गुजारिश है मेरी
उन बीती बातों को तू भुला ही क्यों नहीं देता?

Wednesday, 25 February 2015

प्यार



जब राहें मंजिल से ज्यादा अच्छी लगें
जब कहानियाँ हकीकत से ज्यादा सच्ची लगें 
जब ख़्वाब कोरे सपनों की जगह ले लें 
जब बेपरवाह नींद बेचैनियों को जगह दे दे
जब हर दिन खुशनुमा और रातें प्यारी हों
जब हर पल जेहन में अजब सी बेकरारी हो
जब हर शख्श अपना लगे,हर बात प्यारी लगे 
जिंदगी बोझ न रहकर,खुशियों की सवारी लगे
जब किसी का हर अंदाज जैसे एक अदा लगे 
जब दूर रहना गँवारा न हो जैसे एक सजा लगे 
तो तुम इकरार करो न करो प्यार तो हुआ है
एक लाइलाज बीमारी जिसकी दवा,सिर्फ दुआ है

Thursday, 29 January 2015

नया साल

दफनाकर काली रातों को
भूलाकर बीती बातो को
आँखों की नमी मिटा दो तुम
अहम का दर्प हटा दो तुम

नयी आशाओं के छाँव तले
नए सपनों का संसार बने
नई धूप में नयी किरण संग
नई अनुभूति का घर-बार बने

कटुता की सब खाई मिट जाये
हम मजहब का अर्थ समझ जाएँ
हर पल हर उदास चेहरा मुस्काएँ
हर घडी हर दिन नयी सौगाते लाये

मुरझायें आशाएँ हरी हो जाये
हर टूटी उम्मीद खड़ी हो जाये
जीवन की शून्यता मिटे ऐसे
जैसे हर बात अंताक्षरी हो जाये

वनिता का सिंदूर अमर हो
प्रेमभाव का स्वर मुखर हों
सुलझ जाये हर उलझी पहेली
नव वर्ष का कुछ ऐसा असर हो

हौसले भी हों और इरादें भी हों
कुछ खट्टी,कुछ मीठी यादें भी हों
वक्त गुजरने के साथ बस ऐसा न हों
कुछ टूटे हुए सपनो के धागे भी हों

Thursday, 4 December 2014

यादें

यादें उनकी अपनी तन्हाई
अश्क आँखों की दिलो की गहराई
अंजुमन व शोहरत की मिली बेवफाई
यादें उनकी अपनी तन्हाई

दर्द हरा होता है
जब कभी पास आती है यादें उनकी
दिल का सौदा हुआ जाता है
शेष बच जाती है यांदे उनकी

वो आये न आये यादें आ ही जाती हैं
चाहता हूँ मुस्कराना पर आँखें भर आती हैं
यादें उनकी अपनी तन्हाई
अश्क आँखों की दिलो की गहराई

Saturday, 15 November 2014

दीवाली

दीवाली दीप के दिव्यार्थ का त्योंहार है

अब तो शक होता है मुझे

देखकर घोर कालिमा राजू के घर में और उसकी आँखों में वेदना

दुःख होता है मुझे

राजू मेरे गावँ का ही एक भोला भाला लड़का है

जिसे दीवाली भी बाक़ी दिनों की तरह ही नजर आती है

ऐसा नहीं की उसे आतिशबाजी का शौक नहीं

और उसे उजियारे की यह स्वर्ण लालिमा रास नहीं आती है

पर वह बेबस है मजबूर है लाचार है

उम्र में छोटा है मगर सबसे समझदार है

आज दीवाली है पर उसके घर में आज भी अँधेरा है

कोई शोर शराबा नहीं लगता है जैसे भूतों का डेरा है

दीवाली उजालों का त्योंहार है पर सबके लिए नहीं

कैसी दीवाली और कहाँ का त्योंहार जब आपके पास पटाखे नहीं और दियें नहीं

देखकर आँशु अपनी माँ की आँखों में

वह कोशिश करता है हसने की हँसाने की बातों ही बातों में

पकड़कर माँ की उंगलियां अपने नन्हे हाथों में

वह कहता है एक गंभीर बात इन चमकती रातों में

माँ तुम रोती क्यों हो दीवाली कल है मैंने पूछा था पंडित जी से

मैं कसम खाता हूँ मैं झूठ नहीं बोल रहा तुम पूछ लो बड़ी दीदी से

फिर वह अपने नन्हे हाथों से आपने माँ के आँशू पोछता है

दर्द में जगता है रात भर और अगले दिन दीवाली मनाने का एक नया तरीका खोजता है

सुबह होते ही वह दौड़ता है आलिशान मकानों के नीचे

कुछ गिरे हुए पटाखे मिल जाये शायद कुछ ऐसे ही सपनो को सींचे

वह खुश है कुछ पटाखे पाकर साथ मे कुछ अधजली मोमबत्तियां भी

अगले दिन वह भी मनाता है दीवाली रोशन होती है उसकी कुटियां भी

पर दीवाली तो कल थी यह उसे भी पता है मुझे भी पता है

दीवाली कल न मन सका वह पर इसमें उसकी क्या खता है

दीवाली तो तब है जब दिल से दिलों के दियें जल जाये

बुझ जाएँ अमीरी गरीबी के फासलों के दियें कमल प्यार के खिल जाएँ

बचपन

मैं खुश नहीं हूँ कि मैं बीस साल का हो जाऊंगा इस बार
काश कि इस जन्मदिन पर कोई मुझे मेरा बचपन देता
काश कि मैं फिर रोता ,मचल जाता
और माँ काम छोड़कर मुझे मनाने आती
मैं फिर करता नटखट सरारते
और दीदी मुझे पापा के डांट से बचाने आती
जीवन कितना सरल होता अगर
मैं हर बात पर रो दिया करता
फिर खिलखिलाता जोर जोर से
हर गम को एक पल में धो दिया करता
देकर थपकियाँ माँ मुझे सुलाती
नानी मुझे प्यारी कहानियां सुनाती
मंजिल क्या है? मालूम न होता
पर पाना है उसे इतना यकीं होता
कि डर लगता हर वक्त मुझे अपनी खामियों से
हिम्मत नहीं हारता मैं कभी अपनी नाकामियों से


भीड़ इतनी थी यहाँ कि पैर रखने की जगह नही थी
और अकेला इतना कि बस मैं ही था और कोई नहीं था
आज मुड़कर देखा तो सबकुछ सुना नजर आ रहा था
पर उस शून्य में मुझे अपना बचपन नजर आ रहा था
बचपन मस्तियों से भरा एक जाम होता है
पर चलना हमें वक्त के साथ होता है
इस जाम को पी नहीं सकता मैं अहसास तो कर सकता हूँ
सपने में ही सही आज खुद का दीदार तो कर सकता हूँ

भरोसा

हर शख्स मुझे रास्ता दिखाता नजर आता है
हर शख्स मुझे पागल बनाता नजर आता है
इन सलाहों के पोटली से परेशान हो गया हूँ मैं
और वे कहते हैं की बदनाम हो गया हूँ मैं

बदनाम होना इतना आसान नहीं
इससे पहले नाम तो होना चाहिए
कब समझदार हो जाऊंगा मैं ऐसा पूछते हैं लोग
अगर ऐसा है तो आज मुझे नादाँ ही होना चाहिए
ये नादानियाँ तुम्हारी शैतानियों से अच्छी हैं शायद
मेरी कहानियाँ तुम्हारी हकीकत से ज्यादा सच्ची हैं शायद
नहीं बनना समझदार मुझे मैं नादाँ ही सही हूँ
मैं अपनी बचकानी आदतों का गुलाम ही सही हूँ
बदल दूँ खुद को ऐसा कोई शौक नहीं है मुझे
तुम्हारी चिल्लाहट तुम्हारी चेतावनी का खौफ नहीं है मुझे
मुझे जीना है मगर अपनी शर्त पर
भरोसा है मुझे खुद पर और अपनी फितरत पर

Monday, 22 September 2014

शाम

ढलते सड़क की आड़   लिए 

जब भानू भू को छोड़ चला

लिया अंधकार ने डेरा अपना

और धरा पर शाम हुई


 ऐसा भी अब हो जाता है

मन  चंचल सा हो जाता है

वादो को कर तितर बितर

एक मूक निमंत्रण छलता जाता है


जाना है बस जाना है

थककर  मैंने यह जाना है

थककर  भी मैंने जाना आज

सबसे मेरी पहचान हुई


इस आलम को कोई तग़ाफ़ुल करता  कैसे

मदमाती होठों को  प्याले  मिले हो जैसे

 घोलती  है अमृत  रस यह छिटकती चाँदनी

अब सबकुछ उसके नाम हुई


लिया अंधकार ने डेरा अपना

और धरा पर शाम हुई

सवाल


क्या हो जब अपना कोई
राहे सफर में छोड़ जाये
लड़खड़ाते कदम से मैं चलूँ
और सामने से मंजिल आ जाये



बुझी हुई चिराग की लौं
एक बार फिर से जल जाये
वो जज्बात जो अर्से से छुपे थे
आंसू बन के मचल जाये



दिल के गुलशन में एक बुलबुल
फिर से कोई चहक जाये
सुना पड़ा ये आशियाँ
एक बार फिर से महक जाये



राह तकती आँखों को
राहत सी आये
और उनके पैरों की
हल्की सी आहट सी आये



सच कहता हूँ आज मैं
पागल सा हो जाऊंगा
दिल कहता है अरसे बाद
आज चैन से सो पाउँगा

१४ सितम्बर

फिर १४ सितम्बर आने वाला है
ओह.......ये मैंने क्या कह दिया?
१४ फ़रवरी होती तो कोई बात थी
१४ सितम्बर भी भला याद रखने की चीज है क्या?
पर कुछ लोगो के लिए ये तारीखें याद रखनी जरूरी होती हैं
जरूरी क्या होती हैं यों कहें की मजबूरी होती है

यह जरिया होता है पहुँचने का,जनता तक नहीं,कुर्सी तक
क्या... सत्ता?हाँ हाँ ठीक समझे आप,जी हाँ उसी तक
आसान नहीं होता इसे पाना,लेनी पड़ती है लोगो की जानें
घर जलाने होते हैं साम्प्रदायिकता की आग में आप मानें या न मानें

उस दिन फिर मंच सजेगा और मैं सुनने को विवश रहूँगा
हिंदी को कुछ दूँ न दूँ,दुकानदारों को जरूर कुछ दूँगा

नेताजी मंच से भाषण शुरू करेंगे पर अपनी फितरत नहीं बदल पाएंगे
हम वहाँ खड़े सोचते रहेंगे की नेताजी अब संभल जायेंगे-अब संभल जायेंगे
पर नहीं,पूरा का पूरा भाषण अंग्रेजी में होगा हर बार की तरह
और यह अंग्रेजी हिंदी को फिर ढक लेगा किसी दीवार की तरह

मुझे सब पता है फिर भी मैं जाऊंगा
आँखों में चमक और दिल में उम्मीद लिए हुए
भूलकर सारे बीते १४ सितम्बर
और मिलें जख्मों को सिए हुए

की शायद यही वह दिन होगा जब कुछ बोलने
के लिए मुझे भी बुलाया जायेगा
और बिना किसी हिचकिचाहट के इन बड़े लोगो के मंच से
रेस्पेक्टेड की जगह पहली बार आदरणीय बोला जायेगा

आज फिर

आज फिर एक बेहयाई ने खींच लायी है
कहने को मिलन हैं,फिर भी जुदाई है
ये राहे सफर ने हमको कहाँ ला खड़ा किया
देखो न मिलने की ये कैसी रूत आई है

दिल के अरमान टूट न जाये भला
तुम उधर खफा हो और इधर रूसवाई है
जरा गौर कर इस ज़माने की नजर को
हर आँखों ने एक नयी सुरूर पायी है
हो मुव्वकल उस बदरी पर जो दिलों पे छायी है
आज फिर एक बेहयाई ने खींच लायी है

गंगा

अहो धन्य माता
पुण्य सलिल गंगे
उत्तर तू धरा पर स्वर्ग छोड़ जब से आई
हिमालय की गोद से निकलकर हिमालय की बेटी कहलायी

इस भू धरा पर तू निर्मल है तबसे
भागीरथी की गंगा आई है जबसे
ब्रम्हा से विलग होकर शंकर जटा समायी
भागीरथी के पुरखो को तारने तू आई
अहो धन्य माता पुण्य सलिल गंगे

हे मन्दाकिनी, पापों से मुक्त करने वाली
शत नमन है तुम्हारा मातेश्वरी हमारी
तभी तो नाम है फिर देवनदी तुम्हारी
रहोगी तुम माता कष्टो को हरने वाली
अहो धन्य माता पुण्य सलिल गंगे

Tuesday, 2 September 2014

लावारिश बच्चे



चलते  हुए सड़क के साथ साथ

देखा एक दृश्य कोताहल भरा

सड़क के उस पार  फुटपाथ पर

बच्चों को लुढ़कते हुए

थे खास न,ना ही उनकी पहचान कोई

बस यूँ हीं शरणार्थी की तरह पड़े हुए


मैंने ठिठक कर देखा एक पल के लिए

फिर रुक गया देखकर उस विह्वल दृश्य को

सोचने लगा फिर एक बार

बुनते है ऐसे हीं उनके भाग्य क्यों?

विस्मत हो रहा था मैं यह देखते हुए

सड़क के उस पार  फुटपाथ पर देखकर

बच्चों को लुढ़कते हुए


अंबर को पिता मानकर उसकी छत्र-छाया में

धरती को माँ समझ उसकी गोद में

वो सो गए थे अपनी कलूट काया लिए हुए

रोटी के एक टुकड़े की आशा लिए हुए

दर्द से मैं ऊबने लगा यह सोचते हुए

सड़क के उस पार  फुटपाथ पर देखा मैंने

बच्चो को लुढ़कते हुए


कैसे कटती है जिंदगी इन लावरिसो की

सामने सजती हैं महफिले उन वारिसों की

वो रंगीं-हसीं शाम मनाते हैं

और ये सड़क पर गिरे हुए चने खाते हैं


ये ग़मों को पीते हुए जीते हैं

सो जाते हैं फिर,एक जूठी पतल भी नसीब नहीं होती

देखते हैं ये लोगों को कातर नैनों से

जो रोजमर्रा की जिंदगी की लत लगाये हुए

चले जा रहे हैं इन्हे कुचलते हुए

सड़क के उस पार  फुटपाथ पर  देखा मैंने

बच्चों को लुढ़कते हुए

बूढी आँखें

दो बूढी आँखें चौराहे पर किसी को ढूढ़ती हैं चंचलता से

इस  भीड़ में उम्मीद कर मिल जाये कोई अपना सा

आते जाते राहगीरों से पहचान हो

या फिर कोई आवाज़ सुनाई दे अपना सा

भरी जवानी था शामिल इस गर्दिश में

हर शख्श अपना था हर राह अपना था

बेचैन होता बस इसी व्याकुलता से

दो बूढी आँखें चौराहे पर किसी को ढूढ़ती हैं चंचलता से

अभी कुछ ही दिन तो हुए बेटी भी अपनी थी बेटा भी अपना था

कालीन बिछे घर और रंग बिरंगी दुनिया, हर शाम अपना था

सोचता रहता सुबहो शाम बड़ी गंभीरता से

दो बूढी आँखें चौराहे पर किसी को ढूढ़ती हैं चंचलता से

Random #38

 इतना तो सचमुच में समझदार बनना था  मुझे भी थोड़ा बहुत अदाकार बनना था  लेकर ढोते हुए सभी जुर्मों को सर अपने  कभी तो सचमुच में गुनाहगार बनना था...