Tuesday, 5 May 2015

चंद लफ़्ज

"दर्द की हद थी शायद वो,कि
एक झटके में सारा डर जाता रहा
वो मेरी जान लेकर जाते रहे
और मैं यूँ ही खड़ा मुस्कराता रहा"

"मुझपे मेरा गाँव छोड़ आने का इल्जाम न दो
मैं अब भी सपने में मिट्टी के महल बनाता हूँ
कभी आंसू ,कभी मुस्कान ,कभी वो किये हुए वादे
खोकर सपने में कहीं,मैं हकीकत भूल जाता हूँ"

"रिश्ते भी महँगे हो गए हैं,बाजार में कीमत की तरह
टूटने का डर बना रहता है हर वक्त , मिट्टी के दीपक की तरह
फ़ासले बढ़ गए हैं दिलों के दरम्यान कुछ इस कदर
जैसे हम सुलग रहे हों, और हर कोई मौजूद है मगर पावक की तरह"


"मैं कैसे ये कह दूँ तुम्हारी चाहत नही है
मुझे उस खुदI की इजाजत नही है
डांट दो बस एक बार यही समझकर
मैं बच्चा हूँ अब भी, सरारत नई है"

"खोकर रोज नींद अपनी तुम्हे चैन से सोने दिया
पोंछे हर आँशु गिरने से पहले,कभी रोने न दिया
और तुमने उनके प्यार का क्या खूब सिला दिया
अपने दोस्तों से तूने,उन्हें घर का नौकर बता दिया"

"चाँद की भी कभी ऐसी हालत हो जाती है
अमावस हो तो चाँदनी चली जाती है
सियासत का भी खेल कुछ ऐसा ही है दोस्तों
हद गुजर जाये तो बगावत चली आती है"

"झोपड़ियां खाली करो,महल बनानी है;उनका फ़रमान आया है "
हम तो चार पैसे न दे पर फिर भी चलो;दरम्यान ईमान आया है" 
इस बदहाली में भी हँस पड़ता हूँ उनके इस ""गंभीर"" रवैये पर 
फिर सर झुकाता हूँ सोचकर, चलो भगवान न सही शैतान आया है"

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