चलते हुए सड़क के साथ साथ
देखा एक दृश्य कोताहल भरा
सड़क के उस पार फुटपाथ पर
बच्चों को लुढ़कते हुए
थे खास न,ना ही उनकी पहचान कोई
बस यूँ हीं शरणार्थी की तरह पड़े हुए
मैंने ठिठक कर देखा एक पल के लिए
फिर रुक गया देखकर उस विह्वल दृश्य को
सोचने लगा फिर एक बार
बुनते है ऐसे हीं उनके भाग्य क्यों?
विस्मत हो रहा था मैं यह देखते हुए
सड़क के उस पार फुटपाथ पर देखकर
बच्चों को लुढ़कते हुए
अंबर को पिता मानकर उसकी छत्र-छाया में
धरती को माँ समझ उसकी गोद में
वो सो गए थे अपनी कलूट काया लिए हुए
रोटी के एक टुकड़े की आशा लिए हुए
दर्द से मैं ऊबने लगा यह सोचते हुए
सड़क के उस पार फुटपाथ पर देखा मैंने
बच्चो को लुढ़कते हुए
कैसे कटती है जिंदगी इन लावरिसो की
सामने सजती हैं महफिले उन वारिसों की
वो रंगीं-हसीं शाम मनाते हैं
और ये सड़क पर गिरे हुए चने खाते हैं
ये ग़मों को पीते हुए जीते हैं
सो जाते हैं फिर,एक जूठी पतल भी नसीब नहीं होती
देखते हैं ये लोगों को कातर नैनों से
जो रोजमर्रा की जिंदगी की लत लगाये हुए
चले जा रहे हैं इन्हे कुचलते हुए
सड़क के उस पार फुटपाथ पर देखा मैंने
बच्चों को लुढ़कते हुए
No comments:
Post a Comment