Monday, 22 September 2014

शाम

ढलते सड़क की आड़   लिए 

जब भानू भू को छोड़ चला

लिया अंधकार ने डेरा अपना

और धरा पर शाम हुई


 ऐसा भी अब हो जाता है

मन  चंचल सा हो जाता है

वादो को कर तितर बितर

एक मूक निमंत्रण छलता जाता है


जाना है बस जाना है

थककर  मैंने यह जाना है

थककर  भी मैंने जाना आज

सबसे मेरी पहचान हुई


इस आलम को कोई तग़ाफ़ुल करता  कैसे

मदमाती होठों को  प्याले  मिले हो जैसे

 घोलती  है अमृत  रस यह छिटकती चाँदनी

अब सबकुछ उसके नाम हुई


लिया अंधकार ने डेरा अपना

और धरा पर शाम हुई

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