आज कही हाले दिल का पता न चल जाए
सर्द हो रहा हूँ मैं सर्दियों सा सिमटकर
सोचता हूँ आँख अपनी क्या ठहर पायेगी
या फूलों सा खिलकर कोई गुल खिलायेगी
गुफ्तगूँ में कही मेरी जाँ निकल न जाए
आज कही हाले दिल का पता न चल जाए
दिल थामता हूँ फिर एक तरकीब से
फिर डरता हूँ लाचारी व अपने नसीब से
डूब न जाए कश्ती किनारे पर ही कही
या सफर के साथ ही मंजिल भी न मिल जाए
आज कही हाले दिल का पता न चल जाए
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