Monday, 22 September 2014

१४ सितम्बर

फिर १४ सितम्बर आने वाला है
ओह.......ये मैंने क्या कह दिया?
१४ फ़रवरी होती तो कोई बात थी
१४ सितम्बर भी भला याद रखने की चीज है क्या?
पर कुछ लोगो के लिए ये तारीखें याद रखनी जरूरी होती हैं
जरूरी क्या होती हैं यों कहें की मजबूरी होती है

यह जरिया होता है पहुँचने का,जनता तक नहीं,कुर्सी तक
क्या... सत्ता?हाँ हाँ ठीक समझे आप,जी हाँ उसी तक
आसान नहीं होता इसे पाना,लेनी पड़ती है लोगो की जानें
घर जलाने होते हैं साम्प्रदायिकता की आग में आप मानें या न मानें

उस दिन फिर मंच सजेगा और मैं सुनने को विवश रहूँगा
हिंदी को कुछ दूँ न दूँ,दुकानदारों को जरूर कुछ दूँगा

नेताजी मंच से भाषण शुरू करेंगे पर अपनी फितरत नहीं बदल पाएंगे
हम वहाँ खड़े सोचते रहेंगे की नेताजी अब संभल जायेंगे-अब संभल जायेंगे
पर नहीं,पूरा का पूरा भाषण अंग्रेजी में होगा हर बार की तरह
और यह अंग्रेजी हिंदी को फिर ढक लेगा किसी दीवार की तरह

मुझे सब पता है फिर भी मैं जाऊंगा
आँखों में चमक और दिल में उम्मीद लिए हुए
भूलकर सारे बीते १४ सितम्बर
और मिलें जख्मों को सिए हुए

की शायद यही वह दिन होगा जब कुछ बोलने
के लिए मुझे भी बुलाया जायेगा
और बिना किसी हिचकिचाहट के इन बड़े लोगो के मंच से
रेस्पेक्टेड की जगह पहली बार आदरणीय बोला जायेगा

3 comments:

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Random #38

 इतना तो सचमुच में समझदार बनना था  मुझे भी थोड़ा बहुत अदाकार बनना था  लेकर ढोते हुए सभी जुर्मों को सर अपने  कभी तो सचमुच में गुनाहगार बनना था...