दो बूढी आँखें चौराहे पर किसी को ढूढ़ती हैं चंचलता से
इस भीड़ में उम्मीद कर मिल जाये कोई अपना सा
आते जाते राहगीरों से पहचान हो
या फिर कोई आवाज़ सुनाई दे अपना सा
भरी जवानी था शामिल इस गर्दिश में
हर शख्श अपना था हर राह अपना था
बेचैन होता बस इसी व्याकुलता से
दो बूढी आँखें चौराहे पर किसी को ढूढ़ती हैं चंचलता से
अभी कुछ ही दिन तो हुए बेटी भी अपनी थी बेटा भी अपना था
कालीन बिछे घर और रंग बिरंगी दुनिया, हर शाम अपना था
सोचता रहता सुबहो शाम बड़ी गंभीरता से
दो बूढी आँखें चौराहे पर किसी को ढूढ़ती हैं चंचलता से
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