Tuesday, 2 September 2014

बूढी आँखें

दो बूढी आँखें चौराहे पर किसी को ढूढ़ती हैं चंचलता से

इस  भीड़ में उम्मीद कर मिल जाये कोई अपना सा

आते जाते राहगीरों से पहचान हो

या फिर कोई आवाज़ सुनाई दे अपना सा

भरी जवानी था शामिल इस गर्दिश में

हर शख्श अपना था हर राह अपना था

बेचैन होता बस इसी व्याकुलता से

दो बूढी आँखें चौराहे पर किसी को ढूढ़ती हैं चंचलता से

अभी कुछ ही दिन तो हुए बेटी भी अपनी थी बेटा भी अपना था

कालीन बिछे घर और रंग बिरंगी दुनिया, हर शाम अपना था

सोचता रहता सुबहो शाम बड़ी गंभीरता से

दो बूढी आँखें चौराहे पर किसी को ढूढ़ती हैं चंचलता से

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