Tuesday, 2 September 2014

बीते हुए कल

मुड़कर देखा और मुस्कराया भी था

भूलकर ही सही एक दीया जलाया भी था

मुझे छोड़कर गम में वो हँसते रहे हर पल

ना याद रखना बीते हुए कल

यादों के झरोखों से आये जो निकलकर

थक जाते हैं हम भी कुछ दूर चलकर

ख़ूबसूरत सही पर हैं शीशे का महल

ना याद रखना बीते हुए कल

कौन याद रखता है उस हसीं ज़माने को

छोड़ जाते है कुछ गम बस रुलाने को

कही बेवफा तो नहीं है समय की पहल

ना याद रखना बीते हुए कल

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