मुड़कर देखा और मुस्कराया भी था
भूलकर ही सही एक दीया जलाया भी था
मुझे छोड़कर गम में वो हँसते रहे हर पल
ना याद रखना बीते हुए कल
यादों के झरोखों से आये जो निकलकर
थक जाते हैं हम भी कुछ दूर चलकर
ख़ूबसूरत सही पर हैं शीशे का महल
ना याद रखना बीते हुए कल
कौन याद रखता है उस हसीं ज़माने को
छोड़ जाते है कुछ गम बस रुलाने को
कही बेवफा तो नहीं है समय की पहल
ना याद रखना बीते हुए कल
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