Tuesday, 18 March 2025

Random #37

 और फिर एक रोज वो नूर भी जाता रहा 

ज़ुस्तज़ू जाती रही, फ़ितूर भी जाता रहा 


खड़े दरख्तों से जब टूट गए शाख़ सब 

सबके साथ होने का गुरूर भी जाता रहा 


बेबाक बातों ने छीन लिया एहतिराम सब 

लिख कर कह देने का दस्तूर भी जाता रहा 


हम तो पशेमान हैं, हम तो कुसूरवार थे 

हथकड़ी में कैद हो बेक़सूर भी जाता रहा 


उसको आता ही नहीं था साथ रहने का हुनर 

हाथ बढ़ाता रहा और दूर भी जाता रहा 

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Random #38

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