Saturday, 15 November 2014

बचपन

मैं खुश नहीं हूँ कि मैं बीस साल का हो जाऊंगा इस बार
काश कि इस जन्मदिन पर कोई मुझे मेरा बचपन देता
काश कि मैं फिर रोता ,मचल जाता
और माँ काम छोड़कर मुझे मनाने आती
मैं फिर करता नटखट सरारते
और दीदी मुझे पापा के डांट से बचाने आती
जीवन कितना सरल होता अगर
मैं हर बात पर रो दिया करता
फिर खिलखिलाता जोर जोर से
हर गम को एक पल में धो दिया करता
देकर थपकियाँ माँ मुझे सुलाती
नानी मुझे प्यारी कहानियां सुनाती
मंजिल क्या है? मालूम न होता
पर पाना है उसे इतना यकीं होता
कि डर लगता हर वक्त मुझे अपनी खामियों से
हिम्मत नहीं हारता मैं कभी अपनी नाकामियों से


भीड़ इतनी थी यहाँ कि पैर रखने की जगह नही थी
और अकेला इतना कि बस मैं ही था और कोई नहीं था
आज मुड़कर देखा तो सबकुछ सुना नजर आ रहा था
पर उस शून्य में मुझे अपना बचपन नजर आ रहा था
बचपन मस्तियों से भरा एक जाम होता है
पर चलना हमें वक्त के साथ होता है
इस जाम को पी नहीं सकता मैं अहसास तो कर सकता हूँ
सपने में ही सही आज खुद का दीदार तो कर सकता हूँ

1 comment:

  1. वो चांदनी रातें भी हमसे रूठ गई
    मौजों की रवानी छूट गई।।
    जब बैठा करते थे, दादी के संग छत पर
    लिए चेहरे पर झुर्रियां, हाथों में पूड़ियां
    बोलती थी वह हमें,देख बेटा वो मामा चांद है

    अब
    दादी बन गई भोज अग्नि की
    चांद ने भी हमसे रिश्ता तोड़ दिया।
    जाते-जाते गम से रिश्ता जोड़ दिया।।

    -गुंजन मिश्रा (फेसबुक पर बना एक नवमित्र)

    *नोट- चांद जो बचपन में मामा नजर आते थे। जवानी में मेहबूबा बन जाते हैं तभी तो गाते हैं चांद सी मेरी मेहबूबा हो ऐसा कब मैंने सोचा था

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Random #38

 इतना तो सचमुच में समझदार बनना था  मुझे भी थोड़ा बहुत अदाकार बनना था  लेकर ढोते हुए सभी जुर्मों को सर अपने  कभी तो सचमुच में गुनाहगार बनना था...