अगर अब मैं आइना देखूँ
तो मुझे क्या दिखाई देगा?
कैद पड़े अश्कों को
इन आखों से कौन रिहाई देगा?
यह जो मैं चीख रहा हूँ
क्या वह दूर तक कहीं सुनाई देगा?
क्या मेरा ज़मीर मेरे बेगुनाह होने की
साफ लहजों में गवाही देगा?
इतना तो सचमुच में समझदार बनना था मुझे भी थोड़ा बहुत अदाकार बनना था लेकर ढोते हुए सभी जुर्मों को सर अपने कभी तो सचमुच में गुनाहगार बनना था...
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