Thursday, 18 July 2024

Random #34

 हमने देखे हैं चंद लम्हों में ज़माने कितने 

उन लम्हों में ज़िन्दगी के फ़साने कितने 


मुड़कर देखने से कभी हैरत तो होती है 

वस्ल की आस में बदले हैं ठिकाने कितने 


मैं जिसकी आरज़ू रही बस राब्ता होना 

वो, जिसे आते थे रंजिशों के बहाने कितने 


हो राज़ मालूम तो क़यास क्यों लगायें जाएँ 

इस रुख़सार पर फ़िदा हैं न जाने कितने 


एक ज़रा सी ख़लिश और फिर राहें जुदा

अब होते हैं इमरोज़ से दीवाने कितने ? 

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Random #38

 इतना तो सचमुच में समझदार बनना था  मुझे भी थोड़ा बहुत अदाकार बनना था  लेकर ढोते हुए सभी जुर्मों को सर अपने  कभी तो सचमुच में गुनाहगार बनना था...