कहाँ आ गए हैं हम और किधर जाना चाहिए था
ऐसे मौसमों में तो कहाँ, बस घर जाना चाहिए था
दूर निकल आये हैं यूँ कि अब तो लगता है जैसे
कुछ देर तो राहें-सफर में ठहर जाना चाहिए था
हम तो चलते चले जाएं पर फ़क़त मसअला ये है
ऐसी आरज़ू से किश्मत को संवर जाना चाहिए था
जब कभी देखा था चाँद को हमने अपने तस्सवुर में
कश्ती से हमको भी चुपचाप उतर जाना चाहिए था
सोचता हूँ, इतनी इबादतों का कुछ हश्र तो होना था
निखर जाना चाहिए था या बिखर जाना चाहिए था
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