ये फ़ासलां जो हमारे दरम्यान रह गया है
छलक आये है आँशु, पैमाना भर गया है
सिर्फ वक्त है जो मुसलसल चल रहा है
मैं ठहर गया हूँ, और तू भी ठहर गया है
इतना तो सचमुच में समझदार बनना था मुझे भी थोड़ा बहुत अदाकार बनना था लेकर ढोते हुए सभी जुर्मों को सर अपने कभी तो सचमुच में गुनाहगार बनना था...
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