जो लोग दहशतों से वाकिफ़ हैं, मुमकिन है वो सहराओं से गुजरे होंगें
इस राह से न जाने की हिदायत दी है, वो भी तो इसी राह से गुजरे होंगे
शहर में दर-बदर भटकते हुए लोग, दौड़ते हुए लोग, गिरते हुए लोग
छुपाकर ख़्वाब अपनी आँखों में किसी रोज अपने गांव से निकले होंगे
अनजान लोगों के जख्मों को चूमते हुए लोग, उनसे लिपटते हुए लोग
शायद किसी की चोटों से वो लोग भी कभी शीशे की तरह बिखरे होगें
इन मौसमों से, बारिशों से, बादलों से, जो इस तरह की ये नाराज़गी है
कभी आदतन मौसमों से खेलते होंगें,आदतन वो बारिशों में भींगते होंगें
हमने जो भी देखा है, जितना देखा है, जितना जाना है, जितना समझा है
वो सभी लोग जो बोलने से डरते हैं, वो सभी लोग लिखकर बोलते होंगें
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