Sunday, 17 July 2016

कुछ कहना है तुमसे

कुछ कहना है तुमसे
सुन सकोगे, शायद नहीं
फिर भी कहना चाहता हूँ
एक आखिरी कोशिश

सुन न पाओ तो इशारा करना बस
चला जाऊंगा मैं वापस मुड़कर
संवेदनाओं को वापस दफ़न कर वहीं
जहाँ पड़ी हुई थी वर्षो से गुमसुम

तुम कहते न थे बहुत बोलते हो तुम
अब खामोश रहना सिख लिया है मैंने
पर पता नहीं क्यों आज जी मैं आया कि
कह दूँ वो सारी चीजें जो वर्षो से कहना चाहता था

न कह पाया तो भी अफ़सोस नहीं होगा
चलो एक बार हिम्मत तो की थी कहने की
आज शब्दों को बिना चुने ही बोलूँगा
जो भी है कहने को, बस बेधड़क

न सुनो तो भी भरोसा दिलाना सुनने का
इतना काफी होगा मेरे लिए, जी हल्का हो जायेगा

कहाँ से शुरू करू, बहुत सारी बाते हो गयी है कहने को
याद है तुम्हे जब पहली बार मिले थे हम, या फिर आखिरी

आखिरी भी नहीं, अरे जब कहा था तुमने कि
वापस जाने के बाद भूल तो नहीं जाओगे मुझे
अच्छा छोड़ो याद है वो दिन जब हम
घर वापस आ रहे थे साथ में और बारिश शुरू हो गयी थी
घंटों बातें की थी हमने पेड़ के नीचे छिपकर
नहीं, अच्छा ये तो याद होगा, जब बैठे रहे थे छत पर पूरी रात 
कैसे हमने एक दूसरे को अपने सपने बताये थे
हमें क्या बनना है, क्या करना है सब कुछ

कितनी जल्दी भूल जाते हो न सारी चीजें
बचपन से लेकर अभी तक वैसे के वैसे हो
मैं ही बदल गया हूँ शायद, चीजों के साथ यादें
सहेजना भी शुरू कर दिया था मैंने जाने के बाद

वैसे ही रहना जैसे मिले थे हम पहली बार
फिर कभी मुलाकात हो गर किसी मोड़ पर
चलों वापस दफ़न करता हूँ सारी संवेदनाओं को
यादों की चादर के साथ फिर उसी जगह पर

किसी को भी किसी के जिंदगी में अचानक यूँ दखल देना का हक़ नहीं होना चाहिए
तुम अच्छे हो, खुश हो, अच्छा लगा जान कर
चलता हूँ वापस जहाँ से आया था बेपनाह उम्मीदों के साथ
बड़ी लंबी जिंदगी है, बेशुमार समय भी, सुना है समय सबसे अच्छी दवा है किसी भी मर्ज की

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