Friday, 1 November 2024

Random#35

 कहाँ आ गए हैं हम और किधर जाना चाहिए था 

ऐसे मौसमों में तो कहाँ, बस घर जाना चाहिए था 


दूर निकल आये हैं यूँ कि अब तो लगता है जैसे 

कुछ देर तो राहें-सफर में ठहर जाना चाहिए था


हम तो चलते चले जाएं पर फ़क़त मसअला ये है

ऐसी आरज़ू से किश्मत को संवर जाना चाहिए था


जब कभी देखा था  चाँद को हमने अपने तस्सवुर में 

कश्ती से हमको भी चुपचाप उतर जाना चाहिए था  


सोचता हूँ, इतनी इबादतों का कुछ हश्र तो होना था 

निखर जाना चाहिए था या बिखर जाना चाहिए था 

Thursday, 18 July 2024

Random #34

 हमने देखे हैं चंद लम्हों में ज़माने कितने 

उन लम्हों में ज़िन्दगी के फ़साने कितने 


मुड़कर देखने से कभी हैरत तो होती है 

वस्ल की आस में बदले हैं ठिकाने कितने 


मैं जिसकी आरज़ू रही बस राब्ता होना 

वो, जिसे आते थे रंजिशों के बहाने कितने 


हो राज़ मालूम तो क़यास क्यों लगायें जाएँ 

इस रुख़सार पर फ़िदा हैं न जाने कितने 


एक ज़रा सी ख़लिश और फिर राहें जुदा

अब होते हैं इमरोज़ से दीवाने कितने ? 

Sunday, 7 July 2024

Random #33

 हमने ये कब चाहा कि वो हमारा सोचें 

डूबने वालों को लाज़िम है किनारा सोचें 


मसरूफ़ियत की दौर में किसे फुर्सत है 

वो तुमको सोचें और फिर दोबारा सोचें 


ख़ुद की काबिलियत पर नाज़ किए बैठे हैं 

वो भी रंज से गुजरें तो फिर सहारा सोचें 


दिल से सोचने वाले इतना नहीं सोचा करते 

दिमाग वाले हैं जो नफ़ा और ख़सारा सोचें 


ये सोचने का सिलसिला है दुनिया वालों का 

किसी को नकारा सोचें, किसी को आवारा सोचें 


Thursday, 27 June 2024

Random #32

 कभी गर मुंतज़िर होना तो फिर खुद की तलाश करना 

जो अनकहा कुछ सुन सके, तुम उसकी तलाश करना 


यूँ तो सभी हैं यहाँ किसी न किसी की तलाश में लापता 

जो कोई हो तुम्हारी तलाश में, तुम उसकी तलाश करना 


आईना गर टूट भी जाये तो चलो जाने दो, कोई बात नहीं 

जो कोई तुम्हें खुद से मिला सके, तुम उसकी तलाश करना 


दिलों के अंदर और बाहर के बीच का ये जो फासला है 

जो इस फासले को मिटा सके, तुम उसकी तलाश करना 


इस शहर में सब है,रौनकें हैं, शोर है, भीड़ है, तन्हाईयाँ हैं 

इन इमारतों में कोई घर बसा सके, तुम उसकी तलाश करना 

Friday, 31 May 2024

Random #31

 जो लोग दहशतों से वाकिफ़ हैं, मुमकिन है वो सहराओं से गुजरे होंगें 

इस राह से न जाने की हिदायत दी है, वो भी तो इसी राह से गुजरे होंगे 


शहर में दर-बदर भटकते हुए लोग, दौड़ते हुए लोग, गिरते हुए लोग 

छुपाकर ख़्वाब अपनी आँखों में किसी रोज अपने गांव से निकले होंगे 


अनजान लोगों के जख्मों को चूमते हुए लोग, उनसे लिपटते हुए लोग 

शायद किसी की चोटों से वो लोग भी कभी शीशे की तरह बिखरे होगें 


इन मौसमों से, बारिशों से, बादलों से, जो इस तरह की ये नाराज़गी है 

कभी आदतन मौसमों से खेलते होंगें,आदतन वो बारिशों में भींगते होंगें 


हमने जो भी देखा है, जितना देखा है, जितना जाना है, जितना समझा है 

वो सभी लोग जो बोलने से डरते हैं, वो सभी लोग लिखकर बोलते होंगें 


Monday, 6 May 2024

Random#30

 सब तजुर्बें, सारे सबक, हैं मेरे करीब क्यूँ

नहीं थे दस्तरस में तो फिर ऐसे शरीक क्यूँ 


राज़ क्या, थी बात क्या, क्यूँ हुए थे आशना 

मैं तो बस हैरान हूँ, थे इतने करीब क्यूँ 


वो ज़ुस्तज़ू, वो नवाज़िशें, हसरतें, वो चाहतें 

फिर इन सभी के बीच में आता नसीब क्यूँ 


इत्तिफ़ाक़ है, है हादसा या कि कोई ख़्वाब है 

अब किसी भी बात का नहीं आता यकीन क्यूँ 


तुम तो आफताब थे, तुम से थी ये रौशनी 

तुम नहीं शरीक क्यूँ, तुम नहीं करीब क्यूँ 




Saturday, 30 March 2024

Random#29

 स्याह रात को रोशन करता हुआ जुगनू कोई 

हो बारिश की बुँदे या हिना की खुशबू कोई 


मशरूफ़ हैं सभी ज़िन्दगी के सफर में ऐसे 

कि होता नहीं अब किसी से रूबरू कोई 


सब्र-ए-इंतज़ार का एक हश्र यह भी तो है 

बचती नहीं किसी भी तरह की आरजू कोई 


है गर खामोश लबों से सुन सकने का हुनर 

फिर आखिर क्यों किसी से करे गुफ़्तगू कोई 


टूटे हुए साज से ये नगमा जो सुना रहा हूँ मैं 

किसी के पाँव से निकल पड़ा है घुँघरू कोई 

Random #38

 इतना तो सचमुच में समझदार बनना था  मुझे भी थोड़ा बहुत अदाकार बनना था  लेकर ढोते हुए सभी जुर्मों को सर अपने  कभी तो सचमुच में गुनाहगार बनना था...