Saturday, 22 March 2025

Random #38

 इतना तो सचमुच में समझदार बनना था 

मुझे भी थोड़ा बहुत अदाकार बनना था 


लेकर ढोते हुए सभी जुर्मों को सर अपने 

कभी तो सचमुच में गुनाहगार बनना था 


जिस शिद्दत से रहा तलबगार दुनिया का 

इस दुनिया को मेरा तलबगार बनना था


चारागरों के बीच में रख छोड़ना था जब 

मुझको तो फिर ज़ेहनी बीमार करना था 


रस्मे-वादा ताउम्र निभाने की चीज है 

ये सोच कोई वादा मेरे यार करना था 

Tuesday, 18 March 2025

Random #37

 और फिर एक रोज वो नूर भी जाता रहा 

ज़ुस्तज़ू जाती रही, फ़ितूर भी जाता रहा 


खड़े दरख्तों से जब टूट गए शाख़ सब 

सबके साथ होने का गुरूर भी जाता रहा 


बेबाक बातों ने छीन लिया एहतिराम सब 

लिख कर कह देने का दस्तूर भी जाता रहा 


हम तो पशेमान हैं, हम तो कुसूरवार थे 

हथकड़ी में कैद हो बेक़सूर भी जाता रहा 


उसको आता ही नहीं था साथ रहने का हुनर 

हाथ बढ़ाता रहा और दूर भी जाता रहा 

Sunday, 19 January 2025

Random#36

 रास्तें में कोई ऐसा शजर होता 

आने-जाने वालों का घर होता 


सब रूकते छावँ की तलाश में 

कितना आसान ये सफर होता 


परिंदा पिंजड़े को तोड़ उड़ता 

कहीं ऐसा भी एक मंजर होता 


आसमां नीचे होता, जमीं ऊपर

दरिया में गिर रहा समंदर होता 


तलवारें म्यान में वापस जाती  

सामने झुका हुआ सर होता 


दिलों में बस रहे ये लोग होते 

गांव में बसा एक शहर होता 




Random #38

 इतना तो सचमुच में समझदार बनना था  मुझे भी थोड़ा बहुत अदाकार बनना था  लेकर ढोते हुए सभी जुर्मों को सर अपने  कभी तो सचमुच में गुनाहगार बनना था...