Thursday, 29 January 2015

नया साल

दफनाकर काली रातों को
भूलाकर बीती बातो को
आँखों की नमी मिटा दो तुम
अहम का दर्प हटा दो तुम

नयी आशाओं के छाँव तले
नए सपनों का संसार बने
नई धूप में नयी किरण संग
नई अनुभूति का घर-बार बने

कटुता की सब खाई मिट जाये
हम मजहब का अर्थ समझ जाएँ
हर पल हर उदास चेहरा मुस्काएँ
हर घडी हर दिन नयी सौगाते लाये

मुरझायें आशाएँ हरी हो जाये
हर टूटी उम्मीद खड़ी हो जाये
जीवन की शून्यता मिटे ऐसे
जैसे हर बात अंताक्षरी हो जाये

वनिता का सिंदूर अमर हो
प्रेमभाव का स्वर मुखर हों
सुलझ जाये हर उलझी पहेली
नव वर्ष का कुछ ऐसा असर हो

हौसले भी हों और इरादें भी हों
कुछ खट्टी,कुछ मीठी यादें भी हों
वक्त गुजरने के साथ बस ऐसा न हों
कुछ टूटे हुए सपनो के धागे भी हों

Random #38

 इतना तो सचमुच में समझदार बनना था  मुझे भी थोड़ा बहुत अदाकार बनना था  लेकर ढोते हुए सभी जुर्मों को सर अपने  कभी तो सचमुच में गुनाहगार बनना था...